मेरी खेतड़ी यात्राः भाग-1


स्वामी विवेकानंद जी और राजस्थान का गहरा संबंध रहा है। बंगाल ने भारत को नरेंद्र दिया और राजस्थान ने विश्व को विवेकानंद। स्वामी विवेकानंद जी ने अलवर, सिरोही, अजमेर, जयपुर और खेतड़ी सहित अनेक स्थानों का भ्रमण किया था।

खासतौर से खेतड़ी का इतिहास स्वामीजी के जिक्र के बिना अधूरा है। एक बार मैं भी खेतड़ी गया था। मुझे तारीख याद है- 22 अप्रेल 2010...यहां स्वामी विवेकानंद जी स्मृति में एक मंदिर है।

बताया जाता है कि पहले यह राजा अजीत सिंह जी का महल था। आज यहां स्वामी जी की स्मृति में मंदिर तथा अन्य परोपकारी कार्य चलते हैं।

2010 में मैंने खेतड़ी आश्रम को एक पोस्टकार्ड लिखा था। जिसमें मैंने पूछा कि मैं स्वामीजी से जुड़े इस स्थान के दर्शन करना चाहता हूं। मुझे किस दिन आना चाहिए?

आश्रम ने मुझे सूचित किया कि किसी भी दिन आ जाइए। दो दिन बाद यानी 22 अप्रेल को मैं वहां गया। आश्रम के मुख्य स्वामी महाराज मुझसे स्नेहपूर्वक मिले।

महाराज पर पूरे आश्रम की गतिविधियों का दायित्व है लेकिन उन्होंने मुझसे विस्तार से बातें कीं और जीवन में सदैव लोककल्याण को लक्ष्य बनाने की बात कही।

उन्होंने मुझे स्नेहपूर्वक भोजन कराया और पूरे आश्रम का अवलोकन कराने के लिए वहां के ही एक सज्जन को जिम्मेदारी सौंप दी।

वे मुझे आश्रम में स्वामीजी से जुड़े विभिन्न स्थानों पर ले गए। इस दौरान हम एक कक्ष में गए जहां विवेकानंदजी का मंदिर है। स्वामीजी जब कभी खेतड़ी आते तो इसी कक्ष में ठहरते थे।

यूं तो खेतड़ी आश्रम से जुड़ी अनेक बातें मेरी यादों में हैं लेकिन एक चीज की छाप आज भी मेरे मन पर है। स्वामीजी के कक्ष में कुछ प्राचीन पत्रों का संग्रह है। ये पत्र स्वामीजी ने लिखे थे।

मैंने गौर किया, स्वामी विवेकानंदजी की हैंडराइटिंग बहुत ही खूबसूरत थी। अगर ये कहूं तो गलत नहीं होगा कि मैंने वैसी हैंडराइटिंग जीवन में फिर कभी नहीं देखी। अक्षरों की बनावट बहुत सुंदर थी।

उन्हीं पत्रों को देखने के बाद मेरे मन में यह खयाल आया कि भारत में ऐसे स्कूल भी होने चाहिए जहां बच्चों को सुंदर हैंडराइटिंग के तरीके सिखाए जाएं। अगर एेसा न हो तो इसे एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए।

मैंने मंदिर में स्वामीजी के चित्र के दर्शन किए आैर उनसे आशीर्वाद मांगा कि मुझे इस योग्य बनाएं कि मैं ऐसा स्कूल खोल सकूं।

अगर मैं स्वामी विवेकानंद जी के जमाने में पैदा हुआ होता और वे ऐसा स्कूल खोलते तो यकीनन मैं उनका पहला शिष्य होता। शेष बातें अगली पोस्ट में हैं। पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए

- राजीव शर्मा, कोलसिया -


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