मेरी खेतड़ी यात्राः भाग-2

पढ़िए, मेरी खेतड़ी-यात्रा का दूसरा भाग आैर जानिए कैसे एक नर्तकी से स्वामी विवेकानंद जी को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ....इस शृंखला की पहली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए 

स्वामी विवेकानंदजी के जीवन में जितने अध्याय हैं, उन सबमें कोई गहरी सीख जरूर है। स्वामीजी की एक खासियत और थी, वे जितने बड़े ज्ञान के साधक थे, जमीन से भी उतने ही जुड़े हुए थे।

वे खेतड़ी के राजमहल में राजा अजीत सिंह के विशेष अतिथि बनकर रहे तो गुमनामी के दिनों में कई बार भूखे पेट भी रहे। लेकिन हर स्थिति में वे वही विवेकानंद थे जो सदैव अपने दिल में देश के दमित, शोषित और पीड़ित लोगों की पीड़ा को लेकर घूम रहा था।

जब मैं खेतड़ी स्थित स्वामी विवेकानंदजी के मंदिर में दर्शन करने गया तो वहां दीवार पर लगी एक पट्टिका पर लिखा हुआ था कि यही वह स्थान है जहां स्वामी जी को एक नर्तकी ने आत्मज्ञान कराया।

दरअसल एक बार जब स्वामीजी खेतड़ी आए तो शाम को वे राजा अजीत सिंहजी के साथ किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। यह स्वामीजी के अमेरिका जाने से पहले की घटना है।

तभी नर्तकियों का एक समूह वहां आया और उन्होंने राजाजी से निवेदन किया कि वे उनका गीत सुनें। मुख्य नर्तकी का नाम मैना बाई था। उल्लेखनीय है कि पुराने समय में शेखावाटी और कई राजघरानों में ऐसी परंपरा होती थी। विशेष अवसरों पर नर्तकियां गीत आैर भजन गाती थीं।

राजा ने मैना बाई को इजाजत दे दी और वह अपने वाद्य यंत्र तैयार करने लगी। तभी वहां बैठे स्वामी विवेकानंद जी सोचने लगे कि क्या एक संन्यासी को यह सब देखना-सुनना शोभा देता है?

क्या ईश्वर की खोज में निकले उन जैसे संन्यासी को नर्तकी का यह गीत सुनना चाहिए? माना कि अजीत सिंह भी वहां हैं, लेकिन वे तो राजा है! कई बार राजा को तो प्रजा का मन रखने के लिए भी बैठना पड़ता है, लेकिन उनके लिए यह कदापि उचित नहीं है कि मोह-माया और घर-संसार को ठोकर मारने के बाद यहां नर्तकी के गीत सुनें।

स्वामीजी ने क्षमा चाही और तुरंत उस जगह से खड़े होकर चले गए। वे महल में आकर उस कक्ष में बैठ गए जहां राजा जी ने उनके लिए ठहरने की व्यवस्था की थी।

वे अब भी इसी विषय पर चिंतन कर रहे थे कि संन्यासी के तौर पर किसी नर्तकी का नाच-गान देखना उन्हें शोभा नहीं देता और इस तरह उनका वहां से चला आना ठीक ही है। उधर मैना बाई भी इस बात को जान चुकी थी।

उसने भी स्वामीजी से जाते-जाते आग्रह किया था कि वह कोई गीत नहीं बल्कि भजन ही सुनाएगी, लेकिन स्वामीजी अपनी बात पर अडिग रहे। पूरी तैयारी के बाद मैना बाई ने एक प्रसिद्ध भजन गाना शुरू किया-

प्रभु मोरे अवगुण चित्त न धरो।
समदरसी है नाम तिहारो चाहो तो पार करो।

एक लोहा पूजा में राखत एक रहत ब्याध घर परो।
पारस गुण अवगुण नहिं चितवत कंचन करत खरो।।

एक नदिया एक नाल कहावत मैलो ही नीर भरो।
जब दो मिलकर एक बरन भई सुरसरी नाम परो।।

एक जीव एक ब्रह्म कहावे सूर श्याम झगरो।
अब की बेर मोहे पार उतारो नहिं पन जात टरो।।


यह आवाज स्वामीजी के कक्ष तक पहुंची। भले ही आज स्वामी जी ने प्रत्यक्ष रूप से यह भजन नहीं सुना लेकिन उसकी ध्वनि उनके कक्ष में बराबर आ रही थी। यह भजन उन्होंने भी कई बार सुना, गाया और गुनगुनाया था।

आज भी वे इसके हर शब्द को ध्यान से सुन रहे थे। भजन पूरा होते-होते उसका जो मर्म उन्होंने आज महसूस किया था, वैसी अनुभूति कभी नहीं हुई थी।

स्वामीजी सोचने लगे, नर्तकी तो सभी जीवों में एक ब्रह्म की बात कर रही है। मेरे गुरु रामकृष्ण परमहंस क्या कहते थे? यही कि सबमें एक ही आत्मा का प्रकाश है।

आत्मा तो नर या नारी नहीं होती। वह तो सिर्फ आत्मा होती है, परमात्मा का अंश। क्या परमहंस ने कभी नर-नारी का भेद किया था? वे तो स्वयं मां के उपासक थे।

फिर मैंने यह भेद क्यों किया? क्या मैं आज तक श्री रामकृष्ण का संदेश ग्रहण नहीं कर सका हूं? मेरे गुरु तो हर महिला में मां के दर्शन करते थे। फिर मैं वहां से क्यों चला आया? ऐसे ही तमाम प्रश्न स्वामीजी के मन में उमड़ रहे थे।

स्वामीजी अपने कक्ष से बाहर निकले और उनके कदम उस दिशा की ओर बढ़ने लगे जहां से वे कुछ ही देर पहले उठकर चले आए थे। उन्होंने जाकर मैना बाई के सामने हाथ जोड़े और बोले- मां, आज तुमने मुझे आत्मज्ञान कराया। मैं तो नर-नारी का भेद कर रहा था और तुमने ब्रह्म का उपदेश दे दिया। मैं तुम्हारा आभारी हूं।

बाद में इस घटना की याद में वहां दीवार पर एक पट्टिका लगाई गई और उस पर मैना बाई से स्वामीजी को हुए दिव्य आत्मज्ञान का उल्लेख किया गया है। यह पट्टिका आज भी लोगों को उस दिन की याद दिला देती है। कभी खेतड़ी जाएं तो जरूर देखिए।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -


Comments

Popular posts from this blog

मारवाड़ी में पढ़िए पैगम्बर मुहम्मद साहब की जीवनी

आखिरी हज में पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने पूरी दुनिया के नाम दिया था यह पैगाम

नई सुबह का उजालाः पढ़िए मेरी पहली कहानी