तस्लीमा, मौत से पहले तुम्हें अफसोस तो बहुत होगा...



कहा जाता है कि जिंदगी के साथ ही मौत की भी शुरुआत हो जाती है। मौत से पहले का वक्त कुछ सीखने, समझने और नेक काम करने के लिए होता है, ताकि इन्सान सुकून के साथ इस दुनिया को अलविदा कह सके। मौत से ही जिंदगी का खात्मा नहीं होता। उसके बाद एक नई जिंदगी और नए सफर की शुरुआत होती है।

मेरी आज की यह पोस्ट समर्पित है तीन लोगों के नाम। ये तीन लोग हैं- तस्लीमा नसरीन, द्वारकानाथ कोटनिस और अयमान अल-जवाहिरी। इन तीनों में कई बातें असमान हो सकती हैं लेकिन कुछ बातों की समानता भी है।

इनमें सबसे बड़ी समानता है- ये सभी बहुत प्रतिभाशाली डाॅक्टर हैं। मुख्य पहचान के तौर पर अल-जवाहिरी आतंकी संगठन अलकायदा का कुख्यात नेता है, जबकि तस्लीमा नसरीन विवादित लेखिका हैं। द्वारकानाथ कोटनिस का जिक्र मैं सबसे आखिर में करूंगा।

मैं शुरुआत करता हूं तस्लीमा के साथ जिन्होंने अब तक कई विवादित किताबें लिखी हैं। मैंने उनकी कुछ पुस्तकों के अंश पढ़े हैं और सोशल मीडिया में आ रहे उनके विचार जानने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि तस्लीमा शायद अपनी जिंदगी के मकसद को लेकर अनिश्चय की स्थिति में रही हैं। एक महिला जो कोशिश करतीं तो शायद कुछ लोगों के लिए फरिश्ता बन सकती थीं, उन्होंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा बेमकसद गुजार दिया।

उन्हें धर्म की बड़ाई पसंद नहीं है, मैं उनकी इस इच्छा का सम्मान करता हूं। वे शराब को पसंद करती हैं और गर्व के साथ बताती हैं कि उनका बाॅयफ्रेंड उनसे उम्र में बहुत छोटा है। यह उनकी निजी जिंदगी है जिसका उन्हें पूरा अधिकार है। वे कहती हैं कि दुनिया के हर मर्द एक जैसे होते हैं।

ये उनके निजी विचार हैं जिनका सही-गलत का फैसला करना मैं जरूरी नहीं समझता। मैं उनका समर्पित पाठक नहीं हूं, फिर भी मैं लेखन के उनके अधिकार की इज्जत करूंगा।

तस्लीमा का जिन लोगों के साथ विरोध है और जिन्हें वे पसंद या नापसंद करती हैं, उन पर अपनी राय देने का वक्त अब नहीं रहा। मैं तस्लीमा के बारे में यह पढ़कर हैरान हूं कि एक काबिल डाॅक्टर ने कैसे अपनी तालीम, तरक्की, अक्लमंदी और हुनर में अपने हाथों आग लगा दी।

उनका विरोध अपनी जगह है लेकिन उन्हें अपनी काबिलियत का सकारात्मक कार्यों के लिए इस्तेमाल करना चाहिए था। ऐसा न करने का जितना नुकसान तस्लीमा को हुआ उतना ही इस दुनिया को भी है।

तस्लीमा के लिए मैं अभिव्यक्ति के अधिकार का पुरजोर समर्थन करता हूं, लेकिन वह सिर्फ विरोध पर ही आधारित नहीं होनी चाहिए। अगर उन्हें किसी मौलवी, पंडित या पादरी में कमी नजर आती है तो कलम के जरिए उनका विरोध जायज है लेकिन यह भी जरूरी है कि आप बदले में इस दुनिया को क्या देकर जा रहे हैं।

इस काबिल डाॅक्टर के बांग्लादेश में प्रवेश पर प्रतिबंध है। तस्लीमा न जाएं बांग्लादेश लेकिन दुनिया इतनी बड़ी है और इतने लोग बीमार व बेसहारा हैं.. उनके इलाज से उन्हें किसने रोका है?

दुनिया में लाखों लोग सिर्फ इस वजह से मर जाते हैं क्योंकि उन्हें सही वक्त पर डाॅक्टर की मदद नहीं मिल पाती। क्या ही अच्छा होता, अगर तस्लीमा इस दुनिया के गरीब और बीमार लोगों का सहारा बनी होतीं!

अल-जवाहिरी का मामला इससे ठीक अलग है। यह मशहूर और हुनरमंद डाॅक्टर कुरआन को तो मानता है लेकिन कुरआन की नहीं मानता। इस शख्स ने अपनी ज्यादातर जिंदगी मासूम लोगों का कत्ल करने और बेगुनाहों का खून बहाने में गुजार दी।

क्या ही अच्छा होता, अगर वह बंदूक के ट्रिगर के बजाय बीमार और गरीबों की नब्ज से मुहब्बत करता! अगर वह दहशत का ये खूनी खेल छोड़कर लोगों को नई जिंदगी देने की कोशिश करता तो शायद ऊपर वाला भी उसके कई गुनाह माफ कर देता।

द्वारकानाथ कोटनिस भी एक डाॅक्टर थे। जब दुनिया में दूसरा महायुद्ध छिड़ा हुआ था और जंग के शोले सुलग रहे थे तब डाॅ. कोटनिस ने चीन में जख्मी और बीमार लोगों की बहुत सेवा की। उन पर ऐसा जुनून सवार था कि दूसरों की जान बचाने में उन्होंने अपने शरीर की भी परवाह नहीं की।

दूसराें की जिंदगी बचाते हुए ही इस युवा डाॅक्टर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। चीन के लोग आज तक उनके बलिदान को नहीं भूले हैं और उन्हें देवता की तरह याद करते हैं।

काश, तस्लीमा और अल-जवाहिरी ने उनके बारे में पढ़ा होता! अल-जवाहिरी के लिए वापसी के रास्ते आसान नहीं हैं लेकिन तस्लीमा के लिए आज भी कई रास्ते खुले हैं। मैं तस्लीमा को अपने फैसले पर सोचने के लिए यह बिनमांगी राय देना चाहूंगा, वर्ना मौत से पहले उन्हें अफसोस तो बहुत होगा।

चलते-चलतेः आपके न होने से इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन आपके होने से दुनिया को बहुत फर्क पड़ सकता है। अपनी काबिलियत का एक भाग इस दुनिया को अधिक सुंदर बनाने में लगाइए।

- राजीव शर्मा, कोलसिया

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Comments

  1. बहुत प्यारा ब्लॉग है भाई

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    1. शुक्रिया भार्इ Abdul Muqeet Khan जी..

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  2. शानदार, बहुत अच्छा लगा आपका ब्लॉग ये केवल तीनों की बात नहीं है हम सब पर भी लागू होती है हम क्या कर रहे हैं और जो कर रहे हैं वो कितना सार्थक है ये सवाल खुद से ज़रूर करना चाहिए।

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