र्इसा, तुम्हारे लिए तो मैं भी क्रूस पर चढ़ने के लिए तैयार हो जाता



मेरी कुछ सबसे पसंदीदा इमारतों में चर्च भी शामिल हैं। मुझे जब समय मिलता है तो मैं इंटरनेट पर दुनिया के बहुत पुराने चर्च की फोटो देखता हूं। वहां की बेंच और उन पर रखी बाइबिल की प्रतियां।

वहां बैठकर कितनों की प्रार्थनाएं परमेश्वर तक पहुंची होंगी, कितने ही शीश उसकी इबादत में झुके होंगे और कितनी ही उंगलियों ने पवित्र वचन पढ़ा होगा।

चर्च की खामोशी और उस खामोशी से पैदा होने वाली शांति, वहां परमेश्वर की स्तुति और प्रार्थनाओं की सामूहिक ध्वनि मुझे बहुत अच्छी लगती है। मुझे नहीं लगता कि चर्च जैसी पवित्र जगह जाने के लिए किसी को अपनी पहचान या धार्मिक मान्यताओं का त्याग करना पड़ता है। आखिर हम हैं तो एक ही खुदा के बंदे।

न जाने कौनसा वह दिन रहा होगा जब हमने भगवान, पैगम्बरों और आसमानी किताबों का बंटवारा कर लिया। मैं हिंदू हूं लेकिन जब भी ईसा मसीह के बारे में पढ़ता हूं, उनके सामने श्रद्धा के साथ उतना ही नतमस्तक हो जाता हूं।

बाइबिल में ईसा मसीह का उल्लेख आता है लेकिन कुरआन में भी उनका कई बार जिक्र हुआ है और बहुत आदर के साथ हुआ है।

मुझे ईसा मसीह के जीवन की सभी बातों में से 3 बातें बहुत अच्छी लगती हैंः

1- उन्होंने एक औरत की पत्थरों की मार से यह कहते हुए रक्षा की कि इसे अगला पत्थर वही मारे जिसने जीवन में कभी पाप नहीं किया।

2- जब उन्हें क्रूस पर लटकाया गया और भयंकर यातनाएं दी गईं तब भी उन्होंने परमात्मा से प्रार्थना की - हे प्रभु, तुम इन्हें माफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं। इतना बड़ा दिल, जिसमें दुश्मन के लिए भी माफी हो! ऐसे नेक दिल को कौन पसंद नहीं करेगा?

3- उन्हें ‘मौत’ के बाद दफनाया गया लेकिन वे तीसरे दिन पुनः जीवित हो गए। उन्होंने अपने शिष्यों और लोगों को नेक जीवन का संदेश दिया और वे पुनः परमेश्वर के घर चले गए।

मृत्यु के बाद अनंत जीवन है, इस बात पर मेरा भरोसा ईसा मसीह ने और मजबूत किया है। ऐसे महान व्यक्ति के लिए तो मैं भी क्रूस पर चढ़ने के लिए तैयार हो जाता। अगर ऐसा नहीं होता तो अपने वस्त्र से उनके घाव पोंछकर ही संतोष कर लेता।

- राजीव शर्मा, कोलसिया - 

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