कलकत्ता, तेरी जिन गलियों से वो मुसाफिर गुजरा था, उनकी मिट्टी से तिलक लगाने जरूर आऊंगा...


कोलकाता को मैं हमेशा कलकत्ता ही बोलता हूं। अभी तक मैंने यह शहर सिर्फ अखबार, टीवी, तस्वीरों और इंटरनेट के जरिए ही देखा है, कभी जाने का मौका नहीं मिला।

कलकत्ता से सिर्फ बंगाल का ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान का बहुत गहरा रिश्ता है। कभी इसी शहर की स्याही कागज पर उतर कर गीतांजलि बन गई थी। इसी धरती से बेरहम ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इंकलाब का सिलसिला शुरू हुआ था।

कलकत्ते की इन्हीं गलियों से निकलकर कभी एक युवक दक्षिणेश्वर काली मंदिर के साधु रामकृष्ण परमहंस के पास गया था। इस शहर से जुड़े अनेक किस्से हैं और उनकी कई-कई कहानियां हैं।

मेरे परिवार का इतिहास भी कलकत्ता से जुड़ा है। कई पीढ़ियों पहले मेरे पूर्वज यहीं से राजस्थान आए थे। मेरे दादा श्री किशनलाल जी शर्मा कई साल इसी शहर में रहे हैं। उनसे पहले भी हमारे कई परिजन यहां काम कर चुके हैं।

... लेकिन हर शहर का एक मिजाज होता है। कलकत्ता सुनहरी यादें देता है तो इसकी कई कहानियां आंसुओं से भी लिखी गई हैं। ऐसी ही एक कहानी नरेंद्रनाथ दत्त की है जिसे आज पूरा विश्व स्वामी विवेकानंद के नाम से जानता है।

मुझे स्वामीजी के जीवन की एक घटना के बारे में जानकर बहुत आश्चर्य हुआ था। आप पढ़ना जारी रखिए, आपको भी हैरानी होगी। यह तब की बात है जब नरेंद्र के पिताजी की अकस्मात मृत्यु हो चुकी थी।

इससे उनका परिवार गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया। कल तक जो लोग उनका अहसान मानते थे आज उनके भी मिजाज बदले-बदले से नजर आने लगे।

नरेंद्र इसी कलकत्ते की सड़कों पर एक मामूली नौकरी के लिए दफ्तर और दुकानों के चक्कर लगाया करता था। एक दिन पांव का जूता फट गया तो उसने दोनों जूते फेंक दिए, क्योंकि जेब में इतने पैसे नहीं थे कि उसकी सिलाई करवा सके। यह सोचकर मन बोझिल हो रहा था कि अब शायद जूते पहनने का सौभाग्य कभी न मिले।

कलकत्ते की यही गलियां आज उसका कड़ा इम्तिहान ले रही थीं। आखिरकार एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिली। स्कूल के मालिक नरेंद्र से खुश थे लेकिन उसी स्कूल में उनका दामाद भी काम करता था। उसे नरेंद्र से अत्यधिक ईर्ष्या थी।

वह उसे अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। एक दिन उसने स्कूल के सभी बच्चों को नरेंद्र के खिलाफ भड़काया। इसलिए सभी बच्चे एकजुट होकर स्कूल मालिक के पास गए और बोले- नए वाले मास्टर को कुछ पढ़ाना नहीं आता। अब स्कूल मालिक भी मजबूर थे। इस तरह यह नौकरी भी नरेंद्र के हाथ से जाती रही।

जब यही नरेंद्र 11 सितंबर 1893 में अमेरिका के विश्वधर्म सम्मेलन में विवेकानंद के नाम से विश्वविख्यात हो गया तो उनके लिए बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के द्वार खुल चुके थे।

अमेरिका और यूरोप के कई विश्वविद्यालय उन्हें दर्शनशास्त्र विभाग का आजीवन अध्यक्ष बनाना चाहते थे। शोध के लिए मुंहमांगी रकम देने काे तैयार थे लेकिन स्वामीजी ने उनका प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक यह कहते हुए नकार दिया कि संन्यासी ईश्वर के अलावा किसी और की नौकरी नहीं करता।



यह वही युवक था जिसके बारे में भारत के स्कूल ने कहा था कि इसे पढ़ाना नहीं आता लेकिन पश्चिम के देश आज घोषणा कर रहे थे कि इससे अच्छा शिक्षक हमने कभी देखा नहीं! यहां तक कि प्रो. जाॅन हेनरी राइट ने उसके बारे में कहा था - "Here is a man who is more learned than all our learned professors put together."

क्या यह ताज्जुब की बात नहीं कि जिस शख्स को हम पहचान नहीं सके, सही मायने में पश्चिम ने ही उसकी कद्र की। हम आए दिन पश्चिमी सभ्यता और पश्चिमी संस्कृति को दिल खोलकर खरी-खोटी सुनाते हैं लेकिन क्या हमने यह सोचा कि हम उनसे किस मामले में और कैसे कमजोर रह गए।

पश्चिमी देशों के चुनावों में मुद्दे होते हैं शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, बीमा, विशेष बिल। और हमारे पास? हम आज भी जाति, संप्रदाय, भूख, रोटी और भ्रष्टाचार को लेकर चुनाव लड़ते हैं। लानत है ऐसे शासन पर और लानत है ऐसे लोगाें पर जो जाति और धर्म के नाम पर वोट देते हैं।

मैं कहता हूं कि अगर ब्रिटेन और अमेरिका ने तुम्हारे साथ गलत किया है तो उन्हें हर्गिज माफ मत करो लेकिन उनमें जो खूबियां हैं उन्हें सीखने से परहेज भी मत करो। जिस ब्रिटेन का डंका कभी पूरी दुनिया में बजा था और आज भी वह एक बड़ी ताकत है, उसके पीछे कोई तो वजह रही होगी!

जिस अमेरिका के नाम का दुनिया में सिक्का चलता है वह किसी वजह से तो हमसे बेहतर हुआ होगा। मैं बताता हूं उनकी ताकत का राज। बात सिर्फ अमेरिका और ब्रिटेन की नहीं है। हम जापान और चीन को भी इसमें शामिल कर सकते हैं।

ये लोग बहुत मेहनती हैं। मेहनत और ज्ञान की कद्र करते हैं। नए बदलाव को अपनाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हमारे देश में ठीक उलटा है। हम आए दिन संस्कृति के नाम का ढोल पीटते हैं लेकिन मेहनत का नाम सुनते ही हमें बुखार आ जाता है।

हमें घर बैठे-बैठे सातवें वेतन आयोग की पूरी तनख्वाह ब्याज समेत चाहिए, साथ ही ऊपर की इनकम भी लेकिन काम करना हमें बिल्कुल पसंद नहीं। अगर सरकारी दफ्तरों में काम का वक्त एक मिनट भी बढ़ा दिया जाए तो हम सड़कों पर उतर आते हैं कि हमारा समय कम कीजिए, हमें तो आराम करना है। अब आप बताइए, ऐसे कामचोरों के देश का पतन नहीं होगा तो और किसका होगा?

खैर.. हम सिर्फ अपनी भूमिका सुधारकर यह उम्मीद कर सकते हैं कि शायद एक दिन सब अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और दुनिया हमारी रफ्तार देखेगी।

इसके लिए हमें मेहनत का रास्ता चुनना ही होगा। फूटी किस्मत पर आंसू बहाने से कुछ नहीं होने वाला। हमें पसीना बहाना होगा। अब शोर मचाने का वक्त नहीं है चुपचाप काम करने का समय है।

इन्हीं उम्मीदों के साथ.... कलकत्ता, मैं तुमसे वादा करता हूं कि तेरी जिन गलियों से कभी नरेंद्र गुजरा था, उनकी मिट्टी से तिलक लगाने जरूर आऊंगा।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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