मैंने उसे सात साल दिए, वो मुझे पूरी जिंदगी दे गई


अगर मुझसे पूछा जाए कि इस पूरी दुनिया में तुम्हें कौनसी जगह सबसे ज्यादा पसंद है, तो मेरे जवाब में लंदन और न्यूयाॅर्क नहीं होंगे। मैं इस दुनिया में सबसे ज्यादा मुहब्बत करता हूं मेरे गांव कोलसिया के राजकीय विद्यालय से। मेरा गांव कोलसिया जिला झुंझुनूं में है। इसी गांव के राजकीय विद्यालय में मैंने जिंदगी के सात साल बिताए।

वर्ष 2005 में मेरा एक्सीडेंट हो गया था। पेट में भयंकर चोट आई और मुझे जयपुर के एसएमएस हाॅस्पिटल में भर्ती करवाया गया। मेरी हालत बहुत खराब थी। जीवन क्या है? यह बात मुझे उस वक्त पता लगी।

मैंने एसएमएस के वार्ड नं. 3-एच में मौत को बिल्कुल करीब से देखा। मेरे वार्ड में अधिकतर ऐसे रोगी थे जिनकी स्थिति गंभीर थी। यह एक संयोग ही था कि मेरे बिस्तर के पास वाले रोगी तीन-चार दिनों के अंतराल में ईश्वर को प्यारे हो रहे थे।

एक लड़का जो मेरा बहुत अच्छा दोस्त बन गया था एक रात उसकी मौत हो गई थी। मैंने अपनी आंखों से उसे मरते देखा। मुझसे कुछ ही दूरी पर एक बुजुर्ग का बिस्तर था। वे बहुत बूढ़े हो चुके थे।

उनका एक बेटा अस्पताल में भी नमाज पढ़ता था। वे बहुत अच्छे लोग थे और उनके परिवार से अक्सर कोई मेरा हालचाल पूछने आता था।

एक दिन उन बुजुर्ग की हालत कुछ ठीक थी। उस दिन वे दूध पी रहे थे। उधर मेरे ताऊजी श्री पूर्णमल जी शर्मा भी मुझे गिलास से दूध पिला रहे थे।

उन बुजुर्ग ने मुस्कुरा कर मुझे बहुत स्नेह से देखा। मैं भी उन्हें देखकर मुस्कुराया। मैं उनके बिस्तर के पास जाना चाहता था लेकिन शरीर में इतनी जान ही नहीं रही कि दो कदम भी चल सकूं। उसी शाम को उनका इंतकाल हो गया। उनकी मौत का मुझे बहुत दुख हुआ। उनकी वह मुस्कान मैं आज तक नहीं भूला हूं।

इन सब घटनाओं को देखकर मुझे कई बार महसूस हुआ कि अब अगला नंबर मेरा भी हो सकता है। मुझे मरने का कोई डर नहीं था लेकिन इस बात का अफसोस जरूर था मैं मेरे मां-बाप के लिए कुछ नहीं कर सका। मुझे अहसास हो रहा था कि अब मेरा बचना नामुमकिन है। मैं पूरी तरह हिम्मत हार चुका था। मैंने मेरी मां से कहा कि अगर मैं मर जाऊं तो मेरी लाइब्रेरी की चाबी तुम अपने पास ही रखना, किसी को मत देना।

मेरे ताऊजी श्री मुरारी लाल जी शर्मा जयपुर रहते हैं। इस कष्ट और पीड़ा की घड़ी में वे मेरे लिए बहुत बड़ा सहारा बनकर आए। मेरे दो भाई गौरीशंकर शर्मा और पंकज शर्मा तो रात-रात भर मेरे पास बैठे रहते।

... लेकिन जीवन की डोर हर पल कमजोर होती जा रही थी। एक शाम मेरे विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री रणधीर सिंह जी का फोन आया। उन्होंने कहा, बेटा, तुम तो हिम्मत वाले हो। इतनी जल्दी हार कैसे मान गए? हमें तो तुमसे बहुत उम्मीदें हैं ...

वे करीब 15 मिनट तक धाराप्रवाह बोलते रहे। उनके शब्दों का मुझ पर किसी देववाणी की तरह असर हुआ। बात पूरी होने के बाद मुझे महसूस हो रहा था कि मैं अभी मरने वाला नहीं हूं। मैं दुख, पीड़ा और हताशा को भूल गया।

मेरे अंग्रेजी के शिक्षक श्री सरदार सिंह जी तो खुद गांव से चलकर मेरे पास जयपुर आए। गणित के शिक्षक श्री श्रवण कुमार जी खेदड़ अक्सर मुझसे फोन पर बातें कर मेरा हौसला बढ़ाया करते थे।

यह ईश्वर की दया, परिजनों का प्यार और मेरे शिक्षकों का आशीर्वाद ही था कि मैं जिंदा हूं और आप मेरा यह लेख पढ़ रहे हैं।

आज जब कभी मैं सरकारी स्कूलों के बद से बदतर हालात और कई सरकारी शिक्षकों का काम के बजाय आराम के लिए प्रेम देखता हूं तो बहुत दुख होता है। ये कैसे शिक्षक हैं जो अपना कर्तव्य तक नहीं जानते?

जब बैंक, पोस्ट आॅफिस या किसी सरकारी दफ्तर में जाता हूं तो वहां काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों को अक्खड़ व अशालीन भाषा का इस्तेमाल करते और बात-बात पर काटने को दौड़ते देखता हूं तो सोचता हूं कि इन लोगों की शिक्षा और संस्कारों में जरूर कोई कमी रही होगी।

एक मेरे शिक्षक हैं जो सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद इतने विनम्र और आत्मीयता रखने वाले हैं और एक ये लोग जिन्हें न बोलने का सलीका है आैर न सही बर्ताव की तमीज!

मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली समझता हूं कि गांव के सरकारी स्कूल का छात्र रहा। उस स्कूल में सुविधाएं बेशक कम थीं लेकिन मेरे शिक्षक बहुत मेहनती थे। वे मेरे जैसे हजारों विद्यार्थियों को पढ़ा चुके होंगे लेकिन फिर भी उन्होंने मेरा इतना खयाल रखा।

मैं आज भी शाम को विद्यालय के मैदान में जरूर जाता हूं और उसकी धरती को नमन करता हूं, क्योंकि जिस जगह को मैंने जीवन के सात साल दिए, उसने मुझे पूरी जिंदगी दे दी।

(मेरी डायरी के पुराने पन्नों से... यह कहानी 11 नवम्बर 2009 को राजस्थान पत्रिका की परिवार मैग्जीन में प्रकाशित हो चुकी है)

- राजीव शर्मा, कोलसिया - 


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