हलीमा तुझे सलाम, यशोदा तुझे प्रणाम



दुनिया के इतिहास में कितने महान लोग हुए हैं, उनकी तादाद का हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। बड़ा आदमी बनने और इन्सानियत की हैसियत से बड़ा बनने में बहुत फर्क है।

उन बड़े लोगों का नाम और जिस्म खाक में मिल गया जिन्हें अपनी बड़ाई का बड़ा गुरूर था लेकिन वे लोग आज भी इस दुनिया के लिए चमकता सितारा हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी दूसरों की भलाई में बिता दी।

ऐसे लोग यकीनन बड़े हैं, अपने काम की बदौलत और उसके नतीजों को लेकर, लेकिन उन्हें बड़ा बनाने में एक और शख्सियत का हाथ होता है। वो हैं - उनकी मां का। इतिहास ऐसी माताओं को श्रद्धा से नमन करता है जिनके बच्चों के नाम से ये दुनिया रोशन हुई।

आज मैं दो माताओं की बात करूंगा जिनके बेटों का नाम दुनिया में अमर रहेगा। ये ऐसी मां हैं जिन्होंने उन बेटों को जन्म तो नहीं दिया था लेकिन दूध पिलाकर वे इतिहास में अमर हो गईं।

इनमें से एक हैं - हलीमा और दूसरी हैं - यशोदा। हलीमा ने पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) को दूध पिलाया था और यशोदा ने श्रीकृष्ण को। दोनों की किस्मत भी अनोखी थी और दोनों में ही कई समानताएं भी थीं।

जब भी श्रीकृष्ण का नाम आता है, उनकी मां के तौर पर यशोदा का जिक्र पहले होता है। मथुरा के कारागार में जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो वसुदेव उन्हें गोकुल में यशोदा के पास छोड़ आए। ऐसा माना जाता है कि जिस दिन श्रीकृष्ण यशोदा के घर आए, उन्हें हर काम में मुनाफा होने लगा। न केवल धन में बल्कि दूध, दही और व्यापार में भी।

उस वक्त कृष्ण क्या थे? एक ऐसे बालक जो अपने जैविक मां-बाप से दूर थे लेकिन यशोदा ने उन्हें इसकी कमी महसूस नहीं होने दी। वे वहीं मिट्टी में खेले, पले-बढ़े और यशोदा की गोद में ही उन्हाेंने बोलना सीखा। पूरी दुनिया गीता के ज्ञान के लिए श्रीकृष्ण की शुक्रगुजार रहेगी लेकिन जो शब्द उन्होंने इन्सानियत के लिए दिए, असल में उनकी शिक्षक मां यशोदा ही थीं।

कुछ ऐसी ही जिंदगी हलीमा की थी। पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) को जन्म तो आमिना ने दिया था लेकिन उन पर हक हलीमा का भी कम नहीं है। मुहम्मद (सल्ल.) जब गर्भ में थे तभी उनके पिता अब्दुल्लाह का देहांत हो गया था।

उस जमाने में कुरैश घराने में रिवाज था कि मां अपने बच्चों को ज्यादा दिन दूध नहीं पिलाती थीं। इसके लिए दाइयां आतीं और वे ही बच्चों को दूध पिलातीं और पाल-पोसकर बड़ा करतीं। इसके बदले उन्हें बच्चे के मां-बाप से इनाम मिलता था।

एक दिन पास के गांवों से कई दाइयां आईं। उन्होंने अपनी पसंद से बहुत मालदार बच्चों को ले लिया और साथ ले गईं। इस सिलसिले में जिन्होंने भी मुहम्मद (सल्ल.) का नाम सुना उन्होंने उस घर में झांका तक नहीं। मन में सोचा होगा- इस गरीब के घर से हमें क्या मिलेगा? बाप का साया तो इस पर है नहीं और मां से कुछ मिलने की उम्मीद नहीं।

उस वक्त सिर्फ एक दाई ऐसी थी जिसकी गोद आज खाली थी। उसका नाम था हलीमा। वह गरीब थी और किसी ने उसे अपना बेटा नहीं दिया।

शाम होने को थी। सूरल ढलने लगा था। वह भी अपने पति के साथ घर की ओर लौटने लगी। उसने अपने पति से कहा, सभी दाइयों की गोद में बच्चे हैं। मेरी ही गोद खाली है। अगर आप कहें तो मैं उस बच्चे को ले आऊं जिसे किसी भी दाई ने लेना पसंद नहीं किया?

पति ने कहा, ले आओ। क्या पता उस बच्चे के आने से ही हमारे घर में बरकत हो! ... और हलीमा मुहम्मद (सल्ल.) को ले आईं। कौन जानता था कि जिस गरीब को दूध पिलाने का फैसला हलीमा ने किया है, वह एक दिन उसका नाम रोशन करेगा।

जब मुहम्मद (सल्ल.) हलीमा के घर आ गए तो उसे अनेक कामों में फायदा होने लगा। हलीमा ही थी जिसने मुहम्मद (सल्ल.) को बोलना सिखाया। जिस अरबी जबान में उन्होंने नेकी, इंसाफ और भलाई की बातें बताईं, उसके शब्द हलीमा की गोद में ही सीखे थे।

नबी होने के ऐलान के बाद जब आप (सल्ल.) हलीमा से मिले तो मेरी मां-मेरी मां कहते हुए उससे लिपट गए थे। यशोदा व हलीमा को मैं तहेदिल से प्रणाम तथा सलाम करता हूं।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -
 
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