उन लोगों के नाम जो दूसरे महायुद्घ में घायल हुए या मारे गए। यह बात मायने नहीं रखती कि उनके नेता युद्घ में जीते थे या हारे..



दस बजकर दस मिनट

बहुत दिनों की लंबी नींद के बाद आज मेरी आंखें खुली हैं। मैं खुद को काफी तरोताजा महसूस कर रहा हूं, क्योंकि आज मैं पचास साल की नींद के बाद कोमा से बाहर आया हूं।

ये साल मैंने चीन के एक अस्पताल में बिस्तर पर गुजारे हैं। यह मेरी किस्मत से ज्यादा उन डॉक्टरों की मेहनत का नतीजा है, जिनकी वजह से मैं यह दुनिया फिर से देख सका हूं। मुझे ठीक तरह से याद नहीं कि पिछली बार मैं कब सोया था।

लेकिन इतना जानता हूं कि तब एक बड़ा धमाका हुआ था। उसके बाद कोई भारी चीज मुझसे टकराई और मैं तब से लगातार सोता रहा। यह 1940 के आस-पास का ही कोई साल था।

वह दिन मैं कभी नहीं भूल सकता, क्योंकि उस रोज मेरा जन्मदिन भी था। मैं पूरे भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि सूरज अब भी पूर्व दिशा में उदय होता है या उसने भी अपना रास्ता बदल लिया, क्योंकि अब इस दुनिया में बहुत कुछ बदल चुका है।

मैं मेरे घर पहुंच गया हूं। अस्पताल का एक डॉक्टर मुझे गाड़ी से घर छोड़ने आया है। मेरे शहर के सरकारी अफसरों ने मुझे मदद का भरोसा दिलाया और एक आदमी भी कुछ महीनों तक मेरी देखभाल करने के लिए नियुक्त कर दिया है।

मेरा एक छोटा घर है, जिसके पीछे बहुत बड़ा बगीचा है। वहां अब जंगली घास उग आई है और कई वर्षों से उसकी सफाई नहीं हुई। बरामदे में चिट्ठियों का ढेर लगा हुआ है। इनमें से ज्यादातर शादी के कार्ड हैं, जिन पर चालीस के दशक के साल और तारीखें लिखी हुई हैं।

अब इन शादियों में जाने का कोई फायदा नहीं, क्योंकि ज्यादा संभावना इस बात की है कि मेहमान अब तक तो पूरी मिठाई साफ कर चुके होंगे। मैं उम्मीद करता हूं कि ये भाग्यशाली शादीशुदा जोड़े अब तक दादा-दादी बन चुके हैं।

मैं बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठकर बीती बातों को याद करने की कोशिश करता हूं। मेरे हाथों में कुछ लोगों की हंसती-मुस्कुराती तस्वीरें हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। मैं एक बक्सा खोलता हूं जिसमें हवा से भरा हुआ एक गुब्बारा रखा हुआ है।

यह कई साल पहले मैंने यहां रखा था और तब से यह ऐसे ही रखा हुआ है। अब मेरी याददाश्त ने काम करना शुरू कर दिया है और मैं आपसे उन बातों का जिक्र कर सकता हूं, जो कभी मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा थीं।

मेरा जन्म चीन के इसी शहर में हुआ था। यह हमारा पुश्तैनी घर है, जिसका निर्माण मेरे परदादा ने करवाया था। घर से बाहर गली में मेरे पिताजी की छोटी-सी दुकान थी। उन्हें संगीत से लगाव था, लेकिन वे कभी अपने इस शौक को पूरा नहीं कर सके।

इसलिए वे चाहते थे कि मैं बड़ा होकर एक महान वायलिन वादक बनूं और दुनिया को संगीत की बेहतरीन रचनाएं देकर जाऊं। उनकी कमाई ज्यादा नहीं थी, फिर भी उन्होंने मुझे एक वायलिन खरीदकर दी। उन्होंने मेरा नाम उस म्यूजिक स्कूल में लिखवा दिया, जो हमारे शहर से बाहर स्थित था। उसके मास्टर एक मशहूर वायलिन वादक थे।

मैं घर से रोज दस बजे निकलता था, ताकि दस बजकर दस मिनट पर बस स्टॉप पहुंच सकूं। यहां से एक बस मेरे म्यूजिक स्कूल के लिए जाती थी। मेरे पास कोई घड़ी नहीं थी। मेरे पिताजी का कारोबार भी अच्छा नहीं चल रहा था, इसलिए मैंने उनसे घड़ी नहीं मांगी। मैं चाहता था कि मेरे पास भी एक सुनहरी घड़ी हो, जो दुनिया में सबसे ज्यादा सही समय बताए।

मैं अक्सर देर से बस स्टॉप पहुंचता और मेरी बस निकल जाती। मेरे पास ऐसा कोई जरिया नहीं था कि मैं उससे सही समय जान सकूं। मैंने अखबारों में पढ़ा था कि उन दिनों दुनिया में एक बड़ी लड़ाई छिड़ी हुई थी।

मैं उन देशों के शासकों से यह कहना चाहता था कि पूरी धरती जीतकर भी तुम हमारे लिए अच्छा समय नहीं ला सकते। इसलिए बेहतर होगा कि इस मारकाट को बंद कर दिया जाए। मैं उन्हें चिट्ठी लिखना चाहता था, लेकिन मेरे पास उनका पता नहीं था।

मैं रोज इरादा करता कि कल से जल्दी जाने की कोशिश करूंगा, लेकिन मेरा ध्यान रास्ते के दृश्यों में ही भटक जाता। मैं पास के तालाब की उन चमकीली मछलियों को देखना नहीं भूलता, जो मेरे घर से कुछ ही दूरी पर थीं।

वह घोड़ागाड़ी मुझे अब भी याद है, जिसमें शहर के सबसे ज्यादा धनवान व्यापारी की पत्नी घूमने जाती थी। मैं उस मिठाई वाले लड़के को भी नहीं भूल सकता, जो ढेर सारी मिठाइयों के बीच दिनभर बैठा रहता। उस लड़के को देखकर मैंने भी फैसला किया कि एक दिन मैं इससे भी बड़ी मिठाइयों की दुकान खोलूंगा। उस रास्ते में मुझे हर रोज एक लड़की भी मिलती थी, जिसके पास ढेर सारे गुब्बारे थे।

वह पड़ोस के गांव से रोज सुबह मेरे शहर में गुब्बारे बेचने आती थी। मैं उसे देखकर ही यह अंदाजा लगाता कि मैं सही समय पर हूं या आज फिर देर हो गई। मुझे उसका नाम नहीं मालूम, लेकिन वह लड़की समय की बहुत पाबंद थी। इतनी कि लोग उसे देखकर अपनी घड़ियां मिलाया करते थे।

उसके एक हाथ में गुब्बारों के धागे और दूसरे में थैला होता था। उसके कपड़ों को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि वह गरीब परिवार से है। एक दिन जब मैं म्यूजिक स्कूल जा रहा था, तो हमेशा की तरह वह रास्ते में मिली। आज शायद वह मुझे गुब्बारा बेचना चाहती थी, इसलिए उसने मुझे झुककर नमस्ते कहा। जवाब में मैंने भी उसके अभिवादन का उत्तर दिया।

आज आप पूरे पांच मिनट लेट हो गए हैं - उसने कहा।

जी हां, आज मैं देर से उठा था।

अगली बस पांच घंटे बाद आएगी, क्योंकि सभी बसों का इस्तेमाल दूसरे शहर के नागरिकों को युद्ध के माहौल से सुरक्षित निकालने के लिए किया जा रहा है।

ओह, तो आज मेरा समय पर म्यूजिक क्लास पहुंचना संभव नहीं है। अगर इस वक्त मैं तुरंत घर चला जाता हूं तो पिताजी को देर से पहुंचने की मेरी इस बुरी आदत का दुख होगा। इसलिए मैंने तय किया कि आज का पूरा दिन मैं मछलियों के तालाब के पास बैठकर ही बिताऊंगा।

मैंने उस दिन के किराए के पैसे से एक गुब्बारा खरीद लिया। उस लड़की ने तुरंत एक गुब्बारे में हवा भरी और मुझे थमा दिया। वह दिन मैंने उस गुब्बारे और रंगीन मछलियों को देखते हुआ बिताया। मुझे इस बात की खुशी थी कि मेरी देर से जाने की आदत का उस गरीब लड़की को कुछ तो फायदा हुआ।

अगले दिन मैंने फैसला किया कि आज मैं जल्दी उठने की आदत डालूंगा। उस रोज मैं तय समय से पहले ही म्यूजिक क्लास के लिए निकल गया। आज वह गुब्बारे वाली लड़की मुझे देखकर चकित थी।

आज आप पूरे बीस मिनट जल्दी आए हैं। क्या आप अपनी घड़ी देखकर बता सकते हैं कि मैंने सही कहा या गलत? - उसने पूछा।

माफ कीजिए, लेकिन आज मैं मेरी घड़ी घर पर ही भूल आया हूं।

कोई बात नहीं, आज आप जल्दी आए हैं। हर काम समय पर करना एक अच्छी आदत है - उसने कहा।

मुझे डर था कि आज यह फिर मुझे गुब्बारा खरीदने के लिए न कह दे, लेकिन उसने नहीं कहा। बातचीत में उसने बताया कि गांव में लोग कैसे खेतों की रखवाली करते हैं और कैसे कोई सांड चावल के खेतों में घुस आता है। उसने यह भी बताया कि युद्ध खत्म होने के बाद वह भी म्यूजिक क्लास में दाखिला लेगी। उस दिन मैं ठीक समय पर बस स्टॉप पहुंच गया।

वक्त गुजरता गया और दुनिया में चल रहा युद्ध और तेज होता गया। अखबारों से मालूम हुआ कि चीन के कई शहरों का संपर्क आपस में टूट गया है। दूध, अनाज और दूसरा काफी सामान मेरे शहर में बहुत मुश्किल से पहुंच रहा था।

हमारे शिक्षक ने एक दिन हमें बताया कि ऐसे माहौल में भी घबराने की जरूरत नहीं है। हम क्लास तब तक जारी रखेंगे जब तक कि ऐसा मुमकिन होगा। अखबारों के मुताबिक लड़ाई में मेरे शहर को अभी कोई खतरा नहीं था, लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह पूरे भरोसे के साथ कोई भी नहीं बता सकता था।

गुब्बारे बेचने वाली वह लड़की अब भी हर रोज आती थी। उससे मालूम हुआ कि जिस शहर में गुब्बारे बनाने का कारखाना था, वह युद्ध में तबाह हो गया है। इसलिए गुब्बारे आने बंद हो गए और अब उसने अपना व्यवसाय बदल दिया है। अब वह सस्ते गहने बेचने लगी थी, जो उसके ही गांव का एक व्यापारी बनाता था। उसकी टोकरी में कई गहने रखे थे, जो किसी हल्की किस्म की धातु से बने थे।

यह सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा। एक दिन उसने मुझे बताया कि दस बजकर दस मिनट बहुत खास समय है। इसी वक्त पर मेरी बस आती है, लेकिन इसका एक मतलब और भी होता है। इस समय घड़ी की सुइयां ऐसी आकृति बनाती हैं, जैसे कोई मुस्कुराता चेहरा।

इसका मतलब है कि यह समय आपके लिए यादगार रहेगा। वहीं ठीक 12 बजने पर दोनों सुइयां हाथ जोड़ लेती हैं। इसका मतलब है - माफ कीजिए। इससे ज्यादा समय हमारे पास नहीं है। मुझे उस लड़की की समझ पर ताज्जुब था। उसने स्कूली पढ़ाई भी बीच में छोड़ दी थी, लेकिन उसकी बातें विद्वानों को भी हैरत में डालने वाली थीं।

हर रोज उसके पास एक रोचक कहानी होती, जिसे सुनने के लिए मैं घर से जल्दी चलता था। कभी वह बताती कि गुब्बारे बेचने का पेशा उसने इसलिए चुना, क्योंकि गुब्बारे फुलाने से फेफड़े मजबूत होते हैं। कभी वह उस लड़के की कहानी सुनाती जो परियों के देश में एक मिठाई खाकर बकरा बन गया था।

हर रोज उसके पिटारे में ढेरों किस्से होते और मैं उन्हें हर कीमत पर सुनना चाहता था। उसकी कहानियों का फायदा यह हुआ कि देर से जाने की मेरी बुरी आदत सुधर गई और अब मैं समय का पाबंद बन चुका था।

मैंने कभी उसका नाम नहीं पूछा, क्योंकि कहानी पूरी होने के बाद मैं बस स्टॉप की ओर सरपट दौड़ता और वह गहने बेचने चली जाती। इस दौरान उसे यह मालूम हो गया कि मेरे पास कलाई घड़ी नहीं है और मेरे अक्सर देर होने की एक वजह यह भी है।

एक हफ्ते बाद मेरा जन्मदिन था। हमारी ऐसी क्षमता नहीं थी कि इस दिन हम अमीरों की तरह भारी-भरकम खर्चा करके एक यादगार पार्टी मनाएं। मेरे पिताजी चाहते थे कि पार्टी छोटी ही सही, इससे हमें खुश होने का एक मौका तो मिलेगा। हम थोड़ा सुकून महसूस कर सकेंगे।

उन्होंने कहा कि पार्टी में कोई मेहमान नहीं आएगा। बस मेरे दो-तीन दोस्त ही उसमें शामिल होंगे। अगले दिन मैं उस लड़की से मिला और उसे पार्टी के बारे में बता दिया। मैंने उससे निवेदन किया कि वह उसमें जरूर शामिल हो।

यह सुनकर वह चिंतित हो गई। उसने बहाना बनाया कि उसके पास अच्छे कपड़े भी नहीं हैं। मैंने कहा, तुम इन्हीं कपड़ों में आ जाना, क्योंकि यह पार्टी कोई बड़ा आयोजन नहीं है।

आखिरकार वह दिन आ ही गया। उस रोज मैं जल्दी उठा और मछलियों को उनका भोजन डालकर आया। मैं उस लड़की का भी बेसब्री से इंतजार कर रहा था, जो वक्त की बहुत पाबंद थी, लेकिन आज शायद वह लेट थी।

करीब आधा घंटे बाद वह मुझे उस गली में दिखाई दी जिसमें मेरा घर है। आज उसके पास गहनों की टोकरी नहीं थी। उसके हाथ में एक छोटा बॉक्स था। उसने बिल्कुल नए कपड़े पहन रखे थे और वह बिल्कुल किसी परी जैसी लग रही थी।

मैंने उससे जिद की कि वह मुझे बॉक्स खोलकर दिखाए कि उसमें क्या है, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी। मेरे तीन दोस्त भी आ चुके थे और वह लड़की रसोई के काम में मेरी मां की मदद करने लगी।

जन्मदिन की पार्टी शुरू करने के लिए हम घर के सबसे बड़े कमरे में रखी टेबल के पास इकट्ठे हुए। आज बहुत दिनों बाद ही सही, हमारे चेहरों पर एक मुस्कान थी। मेरा पूरा ध्यान उस छोटे बॉक्स पर था और वह मुझे जादू के उस पिटारे जैसा लग रहा था, जिसमें से कोई भी मनपसंद चीज निकाली जा सकती है।

तभी अचानक एक तेज धमाका हुआ। मालूम हुआ कि युद्ध के हवाई जहाजों ने मेरे शहर पर भी हमला कर दिया है। पूरी धरती हिलने लगी थी। अचानक कोई भारी चीज मुझसे टकराई और मैं बेहोश हो गया। उसके बाद क्या हुआ, मुझे कुछ याद नहीं। शायद उस हमले के बाद डॉक्टरों का एक दल यहां आया होगा और उसने मुझे अस्पताल में भर्ती करा दिया।

... और करीब पचास साल बीत जाने के बाद मैं कोमा से बाहर आया हूं। मेरे घर में वह टेबल आज भी है, जहां उस रोज हम जन्मदिन की पार्टी मना रहे थे। मैं चाहता हूं कि हम लोग उस पार्टी को फिर वहीं से शुरू करें, जहां वह अधूरी रह गई थी। मेरे दोस्त मुझे कहीं दिखाई नहीं दे रहे।

मेरी मां रसोई में नहीं है और न ही पिताजी अपनी दुकान में। अगर आपके पास इनकी कोई खबर है तो कृपया इन्हें सूचित कर दीजिए कि मैं पार्टी के लिए इनका इंतजार कर रहा हूं। वह गुब्बारा आज भी उस बक्से में सही-सलामत रखा हुआ है, जो मैंने उस लड़की से खरीदा था। इसमें उसकी सांसें भरी हुई हैं।

मैं अब घर के पीछे वाले बगीचे में आ गया हूं। उसमें काफी जंगली घास उग आई है और आज मुझे उसकी सफाई करनी है। मैं घास काटने और जमीन खोदने के कुछ औजार लेकर आता हूं। पूरी घास काटते-काटते शाम हो गई है।

मैं एक गड्ढा खोद रहा हूं, ताकि वह घास उसमें डाल सकूं। गड्ढा काफी गहरा हो गया है। अभी-अभी मेरा फावड़ा लोहे की एक चीज से टकराया है। मैं जानना चाहता हूं कि यह क्या है? मैं धीरे-धीरे वहां से मिट्टी हटाता हूं।

लोहे की यह चीज एक चौकोर बॉक्स है। उसकी बगल में एक कंकाल भी है। मैं मोमबत्ती की रोशनी में उस बॉक्स को खोलता हूं। उसमें एक सुंदर घड़ी रखी है। वह बंद हो चुकी है, लेकिन उसमें समय हुआ है - दस बजकर दस मिनट।


- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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