माफ करना, हम तुम्हें आंसुआें के अलावा आैर कुछ नहीं दे सकते



कृपया धैर्य के साथ पढ़ें-

देश में सियासी शतरंज खेलने वाले बहुत शातिर होते हैं। सीधे रास्ते की हर टेढ़ी चाल इनके दिलो-दिमाग में छार्इ रहती है। हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होते हैं आैर पांच साल में एक बार हम दिल्ली की सल्तनत चुनते हैं।

हर वक्त सभी पार्टियों के पास खुद के कौरव-पांडव और दूसरों को दिखाने के लिए आईने होते हैं। बड़े-बड़े दावे आैर वादे हमेशा किए जाते हैं जिन पर लोगों काे अब कोर्इ भरोसा नहीं रहा। इन्हीं में से एक है - आरक्षण।

यह कितनी सही है या कितना गलत- इसका फैसला आज मैं नहीं करूंगा। यह फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं। यहां आपको दो लोगाें की सत्यकथा सुना रहा हूं। इसे धैर्य के साथ पढ़िए ...

मेरे एक मित्र हैं जो ब्राह्मण परिवार से हैं। वे सीए हैं और इन दिनों एक नामी फर्म में काम कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले उनसे बात हुई तो पूछा, अब आगे क्या इरादा है?

वे बोले, भाई साहब, अपनी जन्मभूमि मां से बड़ी होती है, लेकिन क्या करें, अब तो इस मुल्क की व्यवस्था से नफरत हो गई है। नेताओं ने आरक्षण का ऐसा जहर घोला है कि हम चाहे कितनी भी आंखें फोड़कर पढ़ाई कर लें, हमारा भारत में कुछ नहीं हो सकता।

आखिर हमारा कसूर क्या है? यही कि मैंने एक ब्राह्मण महिला के पेट से जन्म लिया। लोग कहते हैं कि भैया, तुम्हारे पूर्वजों ने कुछ जातियों पर जुल्म ढाए, उनके कान में शीशा तक भर डाला, इसलिए अब उनका बदला तुमसे लेंगे।

तो भाई, मेरे पूर्वजों ने अगर ऐसा किया भी तो उनका बदला मुझसे क्यों लिया जा रहा है? अगर मेरे पूर्वज इतने क्रूर और पापी थे तो उनसे कहीं ज्यादा जुल्म अंग्रेजों ने इस देश पर ढाए हैं।

फिर आप उनसे बदला क्यों नहीं लेते? क्यों ब्रिटेन की ओर अपने जंगी जहाज रवाना नहीं करते? उनके दरबार में तो ये कानून-कायदे वाले हर इशारे पर मुजरा करने को तैयार रहते हैं।

इसलिए मैंने फैसला किया है कि कुछ दिन और काम का अनुभव लेने के बाद अमेरिका, जापान या यूरोप के किसी अच्छे देश में चला जाऊंगा, वहां खूब मेहनत कर अपने दम पर कुछ हासिल करूंगा। और उसके बाद इस देश की ओर भूलकर भी नहीं आऊंगा। अगर वहीं मरूंगा तो ये मेरा सौभाग्य होगा।

दूसरी घटना मेरे गांव की है। एक बार गांव गया तो उन भाभीजी से मुलाकात हुई जो कई वर्षों से हमारे मोहल्ले में सफाई करने आती हैं। मैं उनका नाम नहीं जानता।

मैं उम्र में उनसे बहुत छोटा हूं फिर भी वे मेरा बड़ों जैसा सम्मान करती हैं। वे उस समय से हमारे घरों में झाड़ू लगाने आ रही हैं जब मैंने चलना भी नहीं सीखा था। वे कड़ी धूप, ठंड, बारिश और हर मौसम में अपना काम करती हैं।

उनकी कभी छुट्टी नहीं होती। झाड़ू लगाने की एवज में उन्हें हर घर से रोज एक रोटी मिलती है। एक दिन मैंने कुछ ‘बड़े’ लोगों से कहा - ये भाभीजी न जाने कितने वर्षों से हमारे घरों की सफाई कर रही हैं।

अगर हम रोज एक रोटी के साथ दिन के हिसाब से एक रुपया देना शुरू कर दें तो यह हमारे लिए कोई बड़ी लागत नहीं है और इससे इनके परिवार को बड़ा सहारा मिलेगा। मेरे इस विचार का तुरंत विरोध हुआ और लोगों ने खिल्ली उड़ाई। एक महाशय बोले- भाई, तेरे ये कानून तू उस वक्त लागू करना जब तू राष्ट्रपति बन जाए।

उस भाभी का कोई मददगार नहीं बना। न वह समाज जिसकी वह वर्षों से गंदगी साफ करती आई है और न वह कानून जो सिर्फ आरक्षण में ही हर समस्या का हल ढूंढ़ता है।

ताज्जुब इस बात का है कि आरक्षण का लाभ लेकर बड़े पदों तक पहुंचने वाले लोग भी बाद में दूसरों से अछूतों जैसा बर्ताव करते हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि अगर आरक्षण ही सब बीमारियों की दवा है तो उस भाभी को इसका फायदा क्यों नहीं मिला? आजादी के बाद से आज तक आरक्षण लागू है, फिर भी इससे लोगाें का कल्याण नहीं हुआ तो इस पर अब पुनर्विचार की जरूरत है।

आरक्षण की भी एक सीमा तो होनी चाहिए। आखिर कब तक सिर्फ जाति के नाम पर ही अयोग्य लोग प्रतिभा का गला काटते रहेंगे? क्या गरीबी किसी एक जाति को देखकर आती है? क्या गरीबी किसी खास धर्म वाले को ही निशाना बनाती है? मेरा मानना है कि जो दलित है, शोषित है, लाचार है, कमजोर है, उसे सरकार आर्थिक रूप से मदद करे।

संसाधन दे आैर बराबरी का हक दे लेकिन बात जब प्रतियोगिता की हो तो सब बराबर होने चाहिए। वहां ये बहाना नहीं होना चाहिए कि हमारे परदादा के साथ एेसा जुल्म हुआ तो अब हमें इस कुर्सी पर हमें बैठाआे। कुर्सी पर योग्य आैर प्रतिभाशाली व्यक्ति बैठना चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या प्रांत का हो। कुर्सी पर बैठाने से पहले काबिलियत देखो, कास्ट नहीं।

स्वतंत्रता के बाद आज तक अापने जिन लोगों को आरक्षण दे दिया, अगर वे अब भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं तो यकीन मानिए इस व्यवस्था में ही खोट है। क्या छह दशक का आरक्षण भी आपका कल्याण नहीं कर सका? आैर अब भी आप आरक्षण चाहते हैं तो यह आपकी जाति या आरक्षण का दोष नहीं, आपको निकम्मेपन का रोग लग गया है।

कोर्इ एससी हो या एसटी, वह सबसे पहले इन्सान है। किसी इन्सान के साथ जाति या धर्म के आधार पर होने वाला भेदभाव गलत है, लेकिन जो जनरल श्रेणी से हैं, वे भी कीड़े-मकोड़े तो नहीं हैं। वे भी इन्सान हैं। फिर उनके साथ ये भेदभाव क्यों? कहीं तो प्रतिभा की कद्र कीजिए।

क्या होगा जब 33 फीसदी वाला डाॅक्टर आपका आॅपरेशन करेगा? मुझसे शर्त लगा लीजिए, एेसा अयोग्य डाॅक्टर मौत से पहले इन्सान को यमलोक भेज देगा। नेता इस बात को जानते हैं, इसलिए वे कभी भी आरक्षण वाले डाॅक्टर से अपना आॅपरेशन नहीं कराते आैर ज्यादातर अमेरिका, सिंगापुर या दिल्ली के प्राइवेट हाॅस्पिटलों में जाकर मरते हैं।

हाल में मैंने फेसबुक पर पढ़ा था-

आरक्षण से बने डाक्टर ने खुद के बारे मे कहा...

हमारी शख्सियत का अंदाज़ा तुम क्या लगाओगे ग़ालिब,,
जब गुज़रते हैं क़ब्रिस्तान से

तो मुर्दे भी उठ के पूछ लेते हैं...
कि डाॅक्टर साहब !!
अब तो बता दो मुझे तकलीफ क्या थी...!!

क्या होगा जब 40 फीसदी वाला इंजीनियर आपके लिए पुल बनाएगा? एेसे अयोग्य इंजीनियर के बनाए पुल उद्घाटन से पहले ही गिर जाते हैं।

सीए साहब आैर भाभी, हमें माफ करना। हम इस देश को जाति आैर आरक्षण के नाम पर फूंक सकते हैं, क्योंकि नेताआें को वोट चाहिए। वे हमारी कब्र को चूल्हा बना सकते हैं आैर चिता को भट्ठी। उन्हें अपनी रोटियां सेंकनी हैं। उनके लिए वोट ही सबकुछ है, देश आैर प्रतिभा जाए भाड़ में। दुअा करो कि फिर कभी भारत में तुम्हारा जन्म न हो। माफ करना, हम तुम्हें आंसुओं के अलावा और कुछ नहीं दे सकते।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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