अब गुंडों से डर नहीं लगता मोदी जी, आप तो हमें पुलिस से बचा लीजिए...



देश में पुलिस व्यवस्था उतनी ही जरूरी है जितनी सरहद के लिए फौज। फौज देश के दुश्मन से मुकाबला करती है और पुलिस का फर्ज होता है नागरिकाें का जीवन सुरक्षित बनाना। यह हमारी मालिक नहीं बल्कि सहयोगी होती है।

कुछ दिनों पहले इंटरनेट और मीडिया में एक फोटो खासी चर्चित रही। यूपी में एक पुलिसवाले ने किसी बुजुर्ग टाइपिस्ट के साथ मारपीट की और ठोकर मारकर उनका टाइपराइटर तोड़ दिया। जब इस मामले ने फेसबुक और मीडिया में जोर पकड़ा तो वह पुलिसकर्मी निलंबित किया गया और टाइपिस्ट को मुआवजा भी दिया गया।

सोचिए, अगर इस मामले ने इतना तूल नहीं पकड़ा होता तो क्या होता...? शायद वह पुलिसकर्मी अपनी गुंडागर्दी को जारी रखता। वह और ज्यादा बेखौफ होकर किसी और की रोजी-रोटी पर लात मारता।

भारत के प्रशासन में एक सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां लोगों को किसी पद पर नियुक्त तो कर दिया जाता है लेकिन आम जनता से शालीन बर्ताव करने का तरीका नहीं सिखाया जाता।

आप किसी भी पुलिस स्टेशन, बैंक, पोस्ट आॅफिस या सरकारी दफ्तर में जाइए, बहुत कम कर्मचारी ऐसे मिलेंगे जो साधारण जनता से शालीन और विनम्र बर्ताव करते हैं। कई तो ऐसे होते हैं जो आम जनता को देखते ही काटने को दौड़ते हैं।

मैं इस शब्द के लिए माफी चाहूंगा। मेरे कहने का ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि सभी सरकारी कर्मचारी ऐसे होते हैं लेकिन यह भी सच है कि सरकारी तंत्र में असभ्य और अशालीन लोगों की संख्या काफी ज्यादा है।

पुलिस में तो ऐसा अक्सर होता है। यह कहूं तो गलत नहीं होगा कि कई बार लोगों को गुंडे-बदमाशों का इतना डर नहीं लगता जितना पुलिस से लगता है। आपको एक सत्य घटना सुनाता हूं।

साल 2014 की बात है। मेरी पिताजी दिल्ली की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते थे। जब ईद का पर्व आया तो कंपनी ने सबको छुट्टी दी। छुट्टी थी तो मेरे पिताजी ने घर आने का मन बना लिया और वे दिल्ली से जयपुर आ गए। रात एक बजे सिंधी कैंप पहुंचे और ऑटोरिक्शा वालों से किराए की बात करने लगे।

उन्हें एक ऑटो ड्राइवर मिला और बोला- साहब, रात एक बजे इतनी दूर कोई नहीं जाएगा, क्योंकि वापसी की सवारी नहीं मिलती, लेकिन आज सुबह मैं कहीं गया हुआ था और शाम को ही ऑटो लेकर आया हूं। तब से एक भी सवारी नहीं मिली। आप कहें तो मैं जाने के लिए तैयार हूं। कल ईद है। आपके किराए से हमारी भी ईद मीठी हो जाएगी।

आखिरकार वह 200 रु. में मान गया। जब ऑटो जयपुर के कुंभा मार्ग इलाके में पहुंचा तो वहां दो पुलिसकर्मी मिले। उन्होंने ऑटो रुकवाया। दोनों ने काफी शराब पी रखी थी। उनके मुंह से बदबू आ रही थी। उन्होंने मेरे पिताजी से पूछताछ की, दिल्ली से जयपुर यात्रा का टिकट देखा और बोले- ठीक है, तुम गाड़ी में बैठे रहो।

फिर वे ड्राइवर की ओर गए, उसे नीचे उतारा, कागजात दिखाने के लिए कहा। सभी कागजात चेक करने के बाद भी उन्हें कोई खामी नहीं मिली। आखिर में वे बोले, तुम्हारी वर्दी कहां है? चलो, चालान कराओ। इस पर वह ड्राइवर उनके आगे हाथ जोड़ने लगा।

पुलिसवालों ने करीब आधे घंटे तक उसे डांटा-फटकारा। ड्राइवर ने उनसे विनती की- साहब, कल ईद है और आज मैंने एक पैसा नहीं कमाया। आप मेहरबानी कर जाने दीजिए, लेकिन पुलिसवालों को नहीं मानना था और वे नहीं माने।

सब दलीलें खत्म होने के बाद उस ड्राइवर ने जेब से अपना तुड़ामुड़ा बटुआ निकाला और उन कर्मठ पुलिसवालों को थमाते हुए बोला, लो साहब, इसमें जो कुछ है वो आप रख लो।

वे पुलिसवाले उस बटुए पर यूं टूट पड़े जैसे मांस पर गिद्ध। उन्होंने बटुए की सभी जेबों से एक, दो, पांच के सिक्कों समेत 50 रु. के तीन नोट निकाल लिए। शायद पूरी रकम 200 रु. रही होगी, जो उन्होंने जेब में डाल ली। उन्होंने उन पैसों की कोई रसीद नहीं दी और चले गए। जाते हुए उन्होंने कहा- चलो, भागो यहां से।

मेरे पिताजी को उस वक्त वह ड्राइवर दुनिया का सबसे ज्यादा बेबस, बदनसीब और मजबूर बाप लग रहा था जो अपने बच्चों को ईद के दिन भी कुछ नहीं दे सकता। वह किराए पर रिक्शा चलाता था और उस दिन इतनी कमाई भी नहीं हुई थी कि वह अपने बच्चों को ईदी दे सके। पिताजी ने उस ड्राइवर को 300 रु. (तय किराए से 100 रु. ज्यादा) दिए और उसे हिम्मत बंधाई। वह चला गया।

मुझे नहीं पता कि उस परिवार ने ईद कैसे मनाई। दूसरे दिन मैंने उस घटना के विरोध में मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक और यहां तक कि प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखा लेकिन वहां से आज तक कोई जवाब नहीं आया।

आखिर हमारी पुलिस व्यवस्था इतनी भ्रष्ट, बेरहम और बेईमान क्यों है? क्या इसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं? अगर नहीं तो इसे बेवजह ढोने से क्या फायदा? बंद करो ये तमाशा। हम अपनी सुरक्षा खुद कर लेंगे।

जब तक पुलिस में मन से बेईमान, डकैत और लुटेरे किस्म के लोग मौजूद रहेंगे तब तक न जाने कितने बच्चे ईदी से वंचित होंगे और न जाने कितनों को दिवाली पर मिठाई नसीब नहीं होगी।

हमारी पुलिस को तमीज और तहजीब का सबक सीखना क्यों जरूरी है, इसके लिए मैं एक महिला का उदाहरण देना चाहूंगा जिसने नाॅर्वे पुलिस के बारे में अपने अनुभव साझा किए थे।

उसने लिखा कि नाॅर्वे में अगर आपको सड़क पार करने में कोई दिक्कत है तो पुलिसवाला खुशी से आपकी मदद करेगा। यहां तक कि कोई बच्चा स्कूल से घर आते वक्त उनसे मदद मांगे तो वे उसे घर छोड़ने भी आ सकते हैं।

वे लोगों से यस सर, यस मैम बोले बिना बात नहीं करते। अगर रात को अकेले में कोई पुलिसकर्मी मिल जाए तो लोगों का हौसला बढ़ जाता है। वे सोचते हैं कि ये मेरा रक्षक है और अपनी जान पर खेलकर भी मेरी हिफाजत करेगा।

भारत में मामला ठीक उलटा है। मदद की उम्मीद तो आप छोड़ ही दीजिए। पुलिसवाले आम जनता के साथ बात की शुरुआत - तेरी मां की, तेरी बहन की ... से करते हैं।

अगर रात को एकांत में किसी पुरुष को पुलिसवाला मिल जाए तो उसे डर लगता है। वह सोचता है कि अब यह मेरी चारों जेबें खाली कर लेगा। अगर किसी महिला को एकांत में पुलिसवाला मिल जाए तो उसे अपनी इज्जत बचाने की फिक्र होती है।

इस पोस्ट के जरिए मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से अपील करना चाहूंगा कि साहब, आपके सब हुक्म सिर-माथे पर, लेकिन कृपया हमें बेईमान और महाभ्रष्ट पुलिस से बचाइए। चोर-बदमाशाें से अपनी सुरक्षा हम खुद कर लेंगे। आप तो पुलिस से ही हमारी सुरक्षा कर दीजिए।

पुलिस को शालीन और सभ्य बनना ही चाहिए ताकि आम लोगों में उसका भरोसा हो। अगर कोई फरियादी थाने में जाए तो पुलिस उससे अच्छा बर्ताव करे। अगर पुलिस का बर्ताव अच्छा हो तो फरियादी की आधी तकलीफ खुद ही खत्म हो जाती है।

पुलिस को भी समझना होगा कि आप अपने देशवासी भाई-बहनों की सुरक्षा के लिए हैं, उनकी कुटाई करने के लिए नहीं। इस संबंध में प्रधानमंत्री को पहल करनी चाहिए और राष्ट्र स्तर पर ऐसी नीति बने कि पुलिस के कामकाज और व्यवहार का बारीकी से मूल्यांकन हो।

हर थाना और पुलिसकर्मी तकनीकी के जरिए सीधे गृहमंत्री की निगरानी में हो। अक्खड़ और असभ्य किस्म के पुलिसकर्मियों की नौकरी से तत्काल छुट्टी होनी चाहिए और उन्हें पेंशन व सरकारी परिलाभों से वंचित किया जाए।

बेईमानों पर कोई रहम नहीं होना चाहिए। जिस पुलिसकर्मी को घूस लेने का रोग लग गया उस पर कम से कम 1000 गुणा जुर्माना, घूस की वसूली, नौकरी से बर्खास्तगी और 50 साल की जेल होनी चाहिए। फिर इस देश में किसी गरीब का बच्चा ईद और दिवाली के दिन मायूस नहीं होगा।
जय हिंद!

- राजीव शर्मा, कोलसिया-


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