मेरे पुरखों ने शहादत से पहले नहीं कहा कि मौत के बाद जनाजा मंदिर के नजदीक न गुजरे

देश में एक अजीब-सी और जहरीली किस्म की हवा घुल रही है। कुछ लोग कहते हैं कि तुम गाय को हाथ तो लगाओ, हम तुम्हें छठी का दूध याद दिला देंगे तो कुछ लोग छाती ठोक कर ऐलान करते हैं- क्या समझते हो, हम तुम्हें गौमांस खाकर दिखाएंगे।

ये किस किस्म के लोग हैं और इनके कैसे इरादे हैं? आज हिंदुस्तान में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब बेटियों की अस्मत नहीं लूटी जाती, ऐसा कोई लम्हा नहीं बीतता जब कोई जिंदगी वक्त से पहले दम नहीं तोड़ती, किसान बदहाल है, अफसरों ने लूट मचा रखी है, लेकिन इन मुद्दों पर बात करने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है। ये किस तरह की बहस लेकर हम बैठ गए हैं और क्यों एक दूसरे को चुनौती दे रहे हैं?

ऐसे हालात देखकर मुझे याद आते हैं वे लोग जिन्होंने 1857 में हिंदुस्तान पर काबिज गोरी हुकूमत की नींव हिला दी थी। कुछ ऐसा ही जमाना था, ऐसी ही घुटन थी, ऐसी ही तकलीफें थीं और ऐसी ही लूट थी लेकिन जब कारतूसों में सूअर और गाय की चर्बी की बात फैली तो वह बात सिर्फ बात नहीं रही, चिन्गारी बनकर इन्कलाब में तब्दील हो गई।

क्या थे वे लोग और कैसे थे उनके इरादे! उनका इन्कलाब किसी हिंदू या मुसलमान के लिए नहीं था। जब गाय पर संकट आया और इस्लाम की पवित्रता को खंडित करने की साजिशें होने लगीं तो हिंदू और मुसलमान एक हो गए।

उस वक्त किसी हिंदू ने यह मांग नहीं की थी कि जनाब कंपनी सरकार, आप कारतूस से गाय की चर्बी हटा दीजिए, सूअर की चर्बी बड़े शौक से मुझे कबूल है। ... और न किसी मुसलमान ने यह मांग की थी कि हुजूर, सूअर की चर्बी कारतूस से निकाल दीजिए क्योंकि गाय मैं बड़े चाव से खाता हूं। उन्होंने हर्गिज ऐसी मांग नहीं की।

इतिहास की पुरानी से पुरानी किताबें उठाकर देख लो, जिस देश और घर में आए दिन बेमतलब की बात पर झगड़े होते हैं वे बहुत जल्द उजड़ जाते हैं और विदेशी उन पर राज करते हैं। हमारे पुरखे इस बात की गहराई को समझ चुके थे।

उन्होंने 1857 में शहादत देते वक्त अपने खून का रंग नहीं देखा था। फांसी के तख्ते पर चढ़ते वक्त किसी हिंदू ने इस बात की परवाह नहीं की थी कि मेरा मुंह काबा की ओर क्यों है। किसी मुसलमान ने यह आखिरी इच्छा नहीं जताई थी कि मौत के बाद मेरा जनाजा मंदिर के पास से नहीं गुजरना चाहिए।

उस जमाने में गाय और इस्लाम की पवित्रता जैसे मुद्दों ने हमें एक किया था। अंग्रेज यह बात बहुत जल्द समझ गए कि यहां राज करना है तो ऐसे गुजारा नहीं होगा। इन लोगों की सबसे बड़ी कमजोरी है - आपसी फूट। इनमें फूट डालो और मजे से राज करो। इन्हें मारने की क्या जरूरत है, ये तो खुद ही खत्म हो जाएंगे! फिर हम गाय भी खाएंगे और सूअर भी। हमारा ब्रिटिश जूता हिंदू के सिर पड़ेगा तो मुसलमान भी इससे बचकर कहां जाएगा!

बड़े अफसोस के साथ लिख रहा हूं कि आज भारत में फिर वही 1857 वाली लहर दौड़ रही है लेकिन यह लहर बिल्कुल उलटी है और ऐसे बहुत कम लोग दिख रहे हैं जो देश की असल तकलीफों की बात करते हैं। परमात्मा ने जिन चीजों पर हमें एक करना चाहा, आज हम उन्हीं के नाम पर लड़ रहे हैं। कोई सूअर के गोश्त की पार्टी देना चाहता है तो कोई गौमांस खाने के लिए मचल रहा है।

मेरे देश को हुआ क्या है? एक वह मुसलमान था जिसने हिंदू और गाय की रक्षा के लिए अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर कहा कि बहुत हुआ तमाशा, अब लंदन का टिकट कटाओ, वर्ना खुदा कसम हम तुम्हारे लिए जहन्नुम का टिकट काटने में देर नहीं लगाएंगे।

एक वह हिंदू था, जिसने इस्लाम की पवित्रता खंडित करने की शैतानी साजिशों को खत्म करने के लिए गोरी हुकूमत के सीने पर बंदूक तान दी थी। ... और एक हम लोग हैं, जो किसी बेगुनाह और बेकसूर शख्स को ‘कड़ा सबक’ सिखाने के लिए उसकी पीट-पीटकर हत्या कर देते हैं या गौमांस खाने में बहादुरी समझते हैं।

मेरे पुरखे जब स्वर्ग से आज का हिंदुस्तान देखते होंगे तो बड़े अफसोस के साथ कहते होंगे कि अंग्रेजों ने तो सिर्फ एक बार हमारे जिस्म का गला घोंटा था, मगर ये औलादें तो हर रोज हमारी आत्मा का गला घोंट रही हैं।

कोई सोच रहा होगा कि कि मौत के बाद हमने रूह अल्लाह को सौंप दी और जिस्म इस हिंदुस्तान की मिट्टी को, मगर मेरी ये कैसी औलादें हैं जिन्हें खाने के लिए सिवाय गौमांस के और कुछ दिखता ही नहीं!

क्या तुम गौमांस खाकर ही इतने बड़े हुए हो? याद करो हमारे पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जिन्होंने कहा कि कभी दूसरों का दिल मत दुखाओ, किसी के दीन का मजाक मत बनाओ। तुम्हें इसका कोई हक नहीं। यहां तक कि जंग के मैदान में भी नहीं।

तुम गाय का मांस खाने के लिए कुरआन का हवाला देते हो कि इसे खाना जायज है लेकिन पहले ये तो बताओ कि कुरआन में लिखी और बातों पर तुम कितना अमल करते हो?

याद करो उस बादशाह बहादुर शाह जफर को जिसने साफ कहा था कि हिंदुस्तान की धरती पर गाय काटने वाले को कभी बख्शा नहीं जाएगा। उसे सजा-ए मौत दी जाएगी। उससे पहले भी बकरीद के मौके पर बादशाहों ने गाय की कुर्बानी देना सख्त मना किया था। भारत में गाय खाने का रिवाज तो ये गोरे लेकर आए थे। गाय हो या सूअर, इन्हें किसी से परहेज नहीं है।

मैं कहता हूं कि अगर गाय पर इतना भयंकर संकट है तो और समस्याएं हम बाद में सुलझा लेंगे, पहले गाय का मसला हल करते हैं। इसके लिए न तो हमें अमरीका की मदद चाहिए और न किसी देश से जंग लड़ने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री मोदीजी संसद में कानून बना दें कि भारत में गौहत्या करने वाले को फांसी की सजा दी जाएगी। यह सबको मंजूर है लेकिन उसमें एक प्रावधान यह होना चाहिए कि जो भी गाय को घर से निकालेगा उसे उम्र कैद होगी।

लोग दूध की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेते हैं और जब वही गाय उनके किसी काम की नहीं होती तो लाठी मारकर घर से बाहर निकाल देते हैं। गौहत्या के असली गुनहगार ऐसे ही लोग हैं। अगर गाय को माता समझते हो तो वैसा बर्ताव भी करो। क्यों कचरा खाने के लिए बाजार में खड़ी करते हो? उस वक्त हमारे गौभक्त कहां चले जाते हैं?

मोदीजी ऐसा कानून बनाएं और जल्द से जल्द बनाएं, क्योंकि हमारे पास और भी मुद्दे हैं और भी समस्याएं हैं, लेकिन किसी भी कीमत पर गाय के नाम पर हो रहा ये खेल रुकना चाहिए। मैं सवाल करना चाहता हूं हमारी सरकार से। आप छह दशक से किसका इंतजार करते रहे?

मैं पूछना चाहता हूं भारत रत्न वाजपेयी साहब से कि आप चाहते तो गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर सकते थे, क्यों नहीं किया? क्या इसके लिए भी पंडित जवाहर लाल नेहरू जिम्मेदार थे?

मैं सवाल करता हूं डाॅ. मनमोहन सिंहजी से कि जब आपको सत्ता मिली तो क्या वाजपेयी साहब आपको यह कदम उठाने से रोक रहे थे? असल में गाय आज चौराहे पर खड़ा कोई जानवर नहीं है। यह वोटों की फसल है और सभी दल इसे मौका देखकर काटना चाहते हैं। इन्हें किसी की कोई परवाह नहीं है।

सभी दल चाहते हैं कि गाय का मुद्दा रहना चाहिए। अगर ये हल हो गया तो किस मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे? एक गाय के पक्ष में खड़ा हो जाएगा दूसरा विरोध में ... और चुनाव के बाद दोनों तरफ के लोग गाय को लाठी मारकर भगा देंगे।

लोगो, सियासत के कुछ शिकारी जाल बिछा रहे हैं। तुम इनके जाल में फंसने वाले कबूतर मत बनो। अगर इस बात को समझना नहीं चाहते तो तुम्हारी मर्जी... तमाशा जारी रखो ताकि दुनिया तालियां बजाए, मगर याद रखना - मरने के बाद पुरखों को कौनसा मुंह दिखाओगे?

- राजीव शर्मा, काेलसिया -

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