जब मैं बनूंगा संपादक तो ऐसा होगा मेरा अखबार


मैं इस दुनिया के उन तमाम लोगों की तरह हूं जिन्हें सपने देखना पसंद है। मैं भी चाहता हूं कि मेरे वे सभी सपने पूरे हो जाएं जो मैं अक्सर खुली आंखों से देखता हूं। मुझे बंद आंखों से भी यही सपने दिखाई देते हैं।

कुछ सपनों को मैं डायरी में नोट कर लेता हूं ताकि उन्हें कभी भूलूं नहीं। मुझे मेरी याददाश्त पर पूरा भरोसा है लेकिन डायरी का कोई मुकाबला नहीं। यह हमें खुद से रूबरू होने का मौका देती है। मैं खुद को उस दिन के लिए तैयार रखता हूं जब मैं किसी अखबार का संपादक बनूंगा।

यह बात अभी महज सपना है लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि यह जरूर सच होगी, क्योंकि मेरे ज्यादातर सपने सच होते आए हैं। असल सवाल यह है कि जिस दिन मुझ पर किसी अखबार की जिम्मेदारी होगी तो वह दिन कैसा होगा?

यकीनन वह एक खास दिन होगा, जिसके लिए मेरे पास पूरी योजना है। खास इसलिए नहीं कि उसी दिन मैं बेहद साफ और कड़क इस्तरी किए कपड़े पहनने शुरू कर दूंगा या जब मैं फेसबुक पर मेरे एक अनजान दोस्त से गप्पे मारता रहूंगा तो बहुत व्यस्त होने का अभिनय करूंगा या मैं मेरे सेक्रेटरी से कह दूंगा कि आप किसी काम के लायक नहीं और बिल्कुल निकम्मे हैं। नहीं, यह दिन इसलिए खास होगा, क्योंकि इसी दिन मैं नए नियम लागू करूंगा।

जो लोग मुझे करीब से जानते हैं, अगर वे इस लेख को पढ़ रहे हैं तो उनके लिए यह दुनिया के सबसे बड़े मजाक से कम नहीं है। फिर भी मुझे पूरा भरोसा है कि ईश्वर इस वक्त मेरी बात सुन रहे हैं। उन तक मेरे शब्द पहुंच चुके हैं। उन्होंने हमेशा मुझे मेरी पसंद से मिलाया है।

हालांकि मेरी उन चीजों की सूची बहुत छोटी है जिन्हें मैं बेहद-बेहद पसंद करता हूं। मेरी पसंद मुझे मिलती जरूर है। अगर मुझे किसी अखबार या की जिम्मेदारी मिलती है तो मैं वहां खास नियम लागू करूंगा। हो सकता है कि कुछ महान प्रबंधक मेरे इन नियमों को कचरे की टोकरी में फेंकने के लायक समझते हों, लेकिन मुझे उनकी कोई परवाह नहीं है।

- मेरे दफ्तर या ऑफिस का इन दोनों में से कोई भी नाम नहीं होगा। मैंने सोच लिया है, इसका नाम होगा - ‘अपना आशियाना’। दफ्तर और ऑफिस जैसे शब्द मुझे बहुत उबाऊ लगते हैं और इनका नाम लेते ही नींद का अहसास होता है।

ये दोनों ही शब्द वहां काम करने वालों को यह संदेश देते हैं कि आप हमारे नौकर हैं। काम खत्म होने के बाद आप भाड़ में जाइए, क्योंकि हमें आपकी कोई परवाह नहीं। ये दोनों शब्द उस जगह से कोई लगाव पैदा नहीं करते।

इनसे ऐसा लगता है कि यहां पत्थर या लोहे के पुतले रहते हैं, जिनसे जबरन काम कराया जाता है। अगर आप इन्सानों से काम चाहते हैं तो आशियाने से बढ़कर कोई जगह नहीं हो सकती। यदि आप डिक्शनरी के निर्माता हैं तो कृपया इन दोनों शब्दों को निकालकर बाहर कीजिए।

- मेरे आशियाने में नौकर या कर्मचारी शब्द पर प्रतिबंध रहेगा। ये शब्द मुझे उस दौर की याद दिलाते हैं जहां एक इन्सान दूसरे पर जुल्म करता है। ये शब्द इन्सान में हीन भावना पैदा करते हैं। इसके लिए सबसे ज्यादा सही शब्द है - साथी। जब सब साथ काम करते हैं तो साथी ही हुए ना! यही ठीक है। नौकर शब्द स्वाभिमान को कमजोर करता है।

- अगर किसी को दुनिया में सबसे ज्यादा अहंकारी मानव बनाना है तो उसका नाम बॉस रख दीजिए। बॉस शब्द मुझे बहुत घमंडी लगता है। इस नाम को स्वीकार कर लेने के बाद इन्सान एक ऐसा प्राणी बन जाता है जिसके सिर पर सींग नहीं होते, फिर भी लोग उससे डरते हैं, क्योंकि वह बिना सींगों के भी उन्हें काफी नुकसान पहुंचा सकता है। मेरा मानना है कि आशियाने में बॉस संस्कृति अब खत्म हो जानी चाहिए। बॉस की जगह कोई और नाम रखना होगा, जो सबका मित्र और साथी हो।

(Note- बाॅस संस्कृति खत्म होनी चाहिए, बाॅस नहीं। उसकी जरूरत रहेगी।)

- मेरे आशियाने में साथियों के फॉर्म में जाति और धर्म का कॉलम नहीं होगा। इन दो चीजों का काम और काबिलियत से कोई रिश्ता नहीं है। इन्हें बेमतलब ढोने से कोई फायदा नहीं है।

- मैंने अक्सर कार्यस्थल पर लोगों को एक अजीब तनाव से गुजरते देखा है। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वे यहां काम करने नहीं बल्कि मातम मनाने आए हैं। तनाव, उदासी, डर के लिए यहां कोई जगह ही नहीं होनी चाहिए।

मैं साथियों से उनकी पसंद-नापसंद पूछूंगा। मैं उनके लिए फेसबुक, ट्विटर, वीडियो साइट्स और उन तमाम चीजों का प्रबंध करूंगा जो सभ्य घरों में देखी जा सकती हैं या जरूरी होती हैं। मैं इन पर प्रतिबंध नहीं लगाऊंगा। मैं उन्हें आजादी दूंगा लेकिन जिम्मेदारी के अहसास के साथ।

- मैं हर रोज नए-नए नोटिस निकालकर उनमें दहशत पैदा नहीं करूंगा। अगर उन्हें छत के नीचे बैठकर काम करना अच्छा नहीं लगता तो वे बाहर बगीचे में भी बैठकर काम कर सकते हैं। बशर्ते ऐसा संभव हो। मैं उनके लिए ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करूंगा जिसमें वे और सहज होकर अपना काम कर सकें।

- मैं उन्हें बताऊंगा कि वे मेरे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। मेरे आशियाने में रक्षाबंधन मनाया जाएगा तो वैलेंटाइन डे पर भी कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा। हालांकि जो इनसे दूर रहना चाहेगा उनकी भावना का पूरा सम्मान किया जाएगा। उन्हें न तो राखी बांधी जाएगी और न ही गुलाब दिया जाएगा।

मेरे साथी चाहें तो रेडियो पर गाने सुनते हुए भी काम कर सकते हैं। यहां मनोरंजन और संगीत पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा। असल मकसद यह रहेगा कि आप किस माहौल में अपनी क्षमता का अधिकतम इस्तेमाल कर सकते हैं।

- मेरे साथियों के लिए डिग्री-डिप्लोमा जरूरी होंगे लेकिन वे अनिवार्य नहीं होंगे। मैं उन्हें समझाऊंगा कि मेरे लिए आपकी प्रतिभा महत्वपूर्ण है। आप बताइए कि कैसे माहौल में काम करना पसंद करेंगे और अपने आशियाने को कैसे आगे ले जा सकते हैं? मैं एक सुझाव पेटी भी लगाऊंगा जो मेरी निगरानी में होगी। कोई भी साथी उसके जरिए मुझे सुझाव दे सकेगा।

- जो भी नियम होगा, वो हमारी सहूलियत के लिए होगा। जिस नियम से हमारा जीना हराम हो जाए, वो नियम नहीं आफत है। उसे तुरंत हटा दिया जाएगा।

- मेरे साथियों के लिए आने और जाने का समय तो होगा लेकिन यह तय करने का अधिकार उन्हें ही दिया जाएगा। बशर्ते ऐसा संभव हो। ऐसा बिल्कुल नहीं होगा कि थोड़ा देरी से आने पर उनके पैसे काट लिए जाएं या उन्हें बेइज्जत किया जाए। अगर थोड़ी देर हो भी जाए तो शाम तक उस काम की भरपाई की जा सकती है।

- आशियाने में कैमरे लगाए जाएंगे लेकिन वे तभी चालू होंगे जब सभी साथी अपने घर जा चुके होंगे। अगर आप किसी को नियुक्त करते हैं तो उसकी पूरी छानबीन कीजिए लेकिन संतुष्ट होने के बाद उस पर भरोसा भी कीजिए। निगरानी के लिए लगाए गए कैमरे लोगों में एक अजीब-सा तनाव पैदा कर देते हैं और वे डर के माहौल में काम करते हैं।

- सभी साथियों को तय दिन वेतन दिया जाएगा और मैं भी उनके ही साथ लाइन में लगकर पैसे लूंगा। यहां सभी बराबर होंगे। और किसी के पास भी विशेषाधिकार नहीं होंगे।

- इस बात की काफी संभावना है कि काम के दौरान मेरे किसी साथी से कोई गलती हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो मैं उसे अपमानित नहीं करूंगा, बल्कि गलती से कैसे बचा जाए, इसका तरीका बताऊंगा। मैं उसे गलती का यह अहसास सबके सामने नहीं कराऊंगा। वहीं, अगर मेरा कोई साथी अच्छा काम करता है तो मैं उसकी प्रशंसा सबके सामने करूंगा।

- मैं उनकी जरूरतों का खयाल रखूंगा और उन्हें अहसास कराऊंगा कि आशियाने की तरक्की में हम सब भागीदार हैं। मैं वहां लोकतंत्र को लागू करूंगा लेकिन इसे हुल्लड़बाजी में तब्दील नहीं होने दूंगा।

- मैं एक कोष बनाऊंगा जिसमें हमारे कारोबार के मुनाफे से एक निश्चित राशि जमा की जाएगी। इस पर तमाम साथियों का हक होगा और सबका हिस्सा बराबर होगा। इससे सभी को गुणवत्ता का अहसास होगा और हम सब मिलकर और ज्यादा मेहनत करेंगे। उम्मीद करता हूं इन नियमों को लागू करने का दिन बहुत जल्द आएगा।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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