नई सुबह का उजालाः पढ़िए मेरी पहली कहानी



नमस्कार साथियों, आज आपके लिए एक खास चीज लाया हूं। यह है मेरी एक कहानी, जिसका शीर्षक है- नर्इ सुबह का उजाला। 3 सितंबर 2014 को यह राजस्थान पत्रिका की परिवार मैग्जीन में छप चुकी है। एक एक सत्य घटना पर आधारित है। अब मैं विदा लेता हूं। आप पढ़िए ये कहानी-

नई सुबह का उजाला

वह चालीस के दशक का दूसरा साल था जब यूरोप से शुरू हुए महायुद्ध की आग सोवियत रूस तक आ पहुंची थी। यह एक बेहद ठंडे मौसम का दौर था जिसकी हवाओं में बारूद की अजीब तीखी गंध घुल चुकी थी।

अब लोग खुली हवाओं में सांस लेना भूल गए थे क्योंकि उनका ज्यादातर वक्त घरों के तहखानों में ही बीतता था। कल तक जो खेत और चारागाह हरे-भरे थे, आज वहां सिर्फ टैंक और बंकर ही दिखाई देते थे। सभी अस्पताल घायलों से भर चुके थे।

आज मास्को में भी काफी सर्दी थी। पूरी रात घना कोहरा छाया रहा जो सुबह भी कम नहीं हुआ। शायद इस शहर की भीड़ को इससे ज्यादा मतलब भी नहीं था। हर रोज सरहदी इलाकों से हजारों की तादाद में लोग यहां चले आ रहे थे।

उनके मुताबिक यही शहर दुनिया में सबसे ज्यादा महफूज है। शहर के एक व्यस्त चौराहे के पास बहुत बड़ा बगीचा था। उसी के एक कोने में चाय की छोटी दुकान थी। यह दुकान रूस के सुदूर गांव से आई एक युवती तान्या की थी। वह मास्को यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर चुकी थी लेकिन जंग के इस माहौल में उसे कोई अच्छा रोजगार नहीं मिला।

तान्या एक सुंदर युवती थी लेकिन इस दुनिया के कुछ नियमों के अनुसार वह आकर्षक नहीं थी। इसकी वजह उसके चेहरे और शरीर के दूसरे हिस्सों पर हुए वे सफेद दाग थे, जो उसे दुनिया की नजरों में अछूत और भयानक बना देते।

यह दस साल पुरानी घटना थी जब उसकी नाक पर एक छोटा दाग हुआ। धीरे-धीरे वह उसके पूरे शरीर पर फैल गए। इसी वजह से तान्या ने आईना देखना छोड़ दिया था। वह क्लास की सबसे आखिरी लाइन में बैठती थी क्योंकि कल तक जो उसकी सहेलियां थीं, अब उन्हें उसके साथ बैठना पसंद नहीं था। उसके अब तक आठ रिश्ते शादी से पहले टूट चुके थे।

दुकान से थोड़ी दूरी पर पत्थर की एक बेंच लगी हुई थी, जो बहुत साल पहले एक अंधे पादरी ने रखवाई थी। उसे दुनिया को अलविदा कहे करीब पचास साल बीत गए। उसकी आखिरी इच्छा के मुताबिक उस बेंच पर यह बात लाल अक्षरों में लिखी गई थी -

जब आप किसी से सच्चा प्रेम करते हैं तो उसके रंग को नहीं देख पाते। इसलिए नहीं कि आप प्रेम में अंधे हो जाते हैं, बल्कि इसलिए कि सच्चे हृदय को आंखों की जरूरत नहीं होती।

इस बेंच के नीचे रात को एक बिल्ली सोती थी। दिनभर यहां बहुत से लोग बैठकर चाय पीते लेकिन बहुत कम लोगों के पास ही इस पर लिखी बात को पढ़ने का वक्त होता था।

आज तान्या की दुकान पर काफी भीड़ थी। यह सर्द मौसम लोगों के लिए आफत लेकर आता था। वहीं कुछ लोगों के लिए यह वरदान से कम नहीं था। खासतौर से चाय की दुकानों के लिए। मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा था जो एक कप गर्म चाय के जरिए इस कड़क सर्दी से कुछ राहत पाना चाहता था।

मैं करीब दस साल पहले रूस आया था। यहां मैं उन वृद्ध आयुर्वेद डॉक्टर का सहायक था जो एक बार मुझे जयपुर में मिले थे। वे मेरी अंग्रेजी की हैंडराइटिंग से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि तुम्हें मास्को में अच्छी हैंडराइटिंग के तरीके सिखाने के लिए क्लास लगानी चाहिए, जिसमें मैं भी शामिल हो सकूं।

डॉक्टर साहब की हैंडराइटिंग बहुत खराब थी लेकिन वे उतने ही भले इन्सान भी थे। वे मुझे यहां ले आए क्योंकि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जिससे वह अपनी भाषा में बात कर सकें।

मैं उसी बेंच पर बैठा वे लाइनें पढ़ रहा था कि तान्या एक शालीन मुस्कान के साथ मेरे लिए चाय लेकर आई। जब मैंने उसे पहली बार देखा तो बेहद दुख हुआ। इतनी सुंदर लड़की के चेहरे पर इतने भयानक दाग कैसे हो सकते हैं!

क्या ईश्वर ऐसा कठोर हृदय भी हो सकता है? जब तक कप खाली नहीं हुआ मैं इसी सवाल में उलझा रहा। मैंने चाय समाप्त की और घर चला आया। पूरे रास्ते मैं उसके बारे में ही सोचता रहा। शायद उस लड़की के पास इलाज के लिए पैसे नहीं होंगे। या फिर उसने पैसे जमा करने के लिए ही यह चाय की दुकान खोली है।

उसका कोट भी काफी पुराना हो चुका है। जब उसने मुझे चाय दी तो मैंने देखा वह कई जगहों से फट भी चुका है। क्या इस सर्द मौसम में उसे एक अच्छे कोट की जरूरत नहीं है? शायद उसके पास नया कोट लाने के लिए पैसे नहीं हैं।

उस रात खाने के बाद मैं अपने कमरे में आया। मैंने मेरा पुराना संदूक खोला। उसमें दो गुल्लक रखी थीं जिन्हें मैं पिछले एक साल से भरने की कोशिश कर रहा था। आखिर मुझे दो गुल्लकों की जरूरत क्या है? इतना लालच ठीक नहीं है।

यह सोचकर मैंने पहली गुल्लक फोड़ दी। उसमें काफी पैसे जमा हो चुके थे। इतने पैसे कि मैं एक अच्छे ऊनी कोट के अलावा छह महीने तक रोज तीन बार चाय पी सकता था।
अगले दिन मैं शहर के सबसे अच्छे बाजार में गया। वहां रंग-बिरंगे कोट, कंबल और दूसरे ऊनी कपड़े रखे थे। एक दुकानदार ने मुझसे पूछा, कहिए सर, आपको कैसा कोटा चाहिए? आप मुझे यहां के तो नहीं लगते।

जी हां, मैं भारत से आया हूं। मुझे एक ऐसा कोट चाहिए जो हर रंग पर फिट बैठे। खासतौर से जिसकी त्वचा पर सफेद रंग के दाग हों।

लेकिन सर, यह कैसा रंग है? किसी भी कंपनी ने ऐसा कोई कोट नहीं बनाया जो आपके मनपसंद रंग से मेल खाता हो।

मैं उलझन में पड़ गया और बोला, अच्छा, फिर काले रंग का एक कोट दे दो, ताकि वह चाय गिरने से जल्द मैला न हो।

मेरे बैग में अब काले रंग का एक मोटा ऊनी कोट था जो दुनिया की किसी भी सर्दी का सामना करने के लिए तैयार था। अब मुझे इंतजार था एक सुहानी शाम का जब यह कोट मैं तान्या को दे सकता। उसी शाम मेरे एक हाथ में गर्म चाय का कप और दूसरे में वह कोट था। मुझे इस बात से थोड़ा डर भी लग रहा था कि कहीं तान्या कोट को लेने से इन्कार न कर दे।

चाय पीने के बाद मैंने हिम्मत जुटाते हुए कहा, मिस तान्या।

जी सर, आपने कुछ कहा?

हां, आज सर्दी बहुत ज्यादा है। एक अच्छी चाय के लिए शुक्रिया।

जी, शुक्रिया तो मुझे आप जैसे ग्राहकों को बोलना चाहिए।

और मैं वहां से चला आया। वह कोट अब भी मेरे पास था। रात के खाने के बाद मैंने तय किया कि मैं उस विनम्र लड़की की मदद के लिए उसकी दुकान पर रोज चार बार चाय पीने जाऊंगा। इससे उसकी कुछ आय तो बढ़ ही जाएगी।

हो सकता है इन पैसों से वह एक अच्छे डॉक्टर से अपना इलाज करा ले। या फिर अपने लिए एक अच्छा कोट ही खरीद ले। मैंने यह भी तय किया कि आज रात ही मैं उसकी दुकान पर यह कोट चुपके से रख आऊंगा। शायद इस तरह वह उसे पहन लेगी।

पक्का इरादा कर मैं घर से निकल पड़ा। मैंने अपना चेहरा एक रुमाल से ढंका। आज मैं पूरा डाकू लग रहा था। मैं वह कोट साथ ले जाना बिल्कुल नहीं भूला जो मैंने कड़ी मेहनत की कमाई से खरीदा था। उस रात बहुत तेज ठंडी हवाएं चल रही थीं। एक बार मेरा मन किया कि वह कोट मैं खुद ही पहन लूं, क्योंकि मेरा कोट भी तो काफी पुराना हो चुका है।

इस भयानक विचार को मैंने बलपूर्वक मेरे दिमाग से बाहर निकाल दिया। मैं तान्या की दुकान के करीब पहुंच गया। उस बेंच के नीचे वह बिल्ली आ चुकी थी जो हर रात वहां सोती थी। बगीचे में गहरा काला अंधेरा छाया हुआ था। मैंने कोट का बैग दुकान के दरवाजे के पास रख दिया। तभी मुझे दूर से कुछ कुत्तों का झुंड दिखाई दिया।

शायद आज वे उस बिल्ली को अपना शिकार बनाना चाहते थे जो उस बेंच के नीचे सोती थी। बिल्ली को वहां न पाकर वे मेरी ओर लपके। इस जल्दबाजी में मैं कोट को वहीं छोड़कर तेजी से भागा। अंधेरा ज्यादा होने से मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, इसलिए रास्ते में दो बार मैं गिर भी गया।

घर पहुंचने के बाद मैंने ईश्वर का शुक्रिया अदा किया कि मुझे कुत्तों के पैने दांतों का शिकार बनने से बचा लिया। इस भगदड़ में मेरी नाक जख्मी हो गई थी और उसमें से ताजा खून बाहर निकल रहा था। मैंने डॉक्टर के थैले से खून रोकने की दवा लेकर नाक पर लगाई और सो गया। उस रात मैं ईश्वर से दुआ करता रहा कि वह उस कोट को कुत्तों से बचाए। पूरी रात मुझे कुत्तों के सपने आते रहे।

दूसरे दिन मैं चाय पीने गया। आज दुकान जल्दी खुल चुकी थी। मुझे पूरा भरोसा था कि आज तान्या जरूर नया कोट पहनेगी लेकिन मुझे यह देखकर झटका लगा कि आज उसने कोई ऊनी कपड़ा नहीं पहन रखा था। मैंने चाय पीने के बाद इसकी वजह पूछी तो मालूम हुआ कि उसके पास एक ही कोट है जो कल रात को धो दिया था। मैंने ध्यान से देखा, उसकी दुकान में मेरा कोट रखा हुआ था।

उस दिन शाम को जब मैं चौथी बार दुकान पर चाय पीने गया तो दरवाजे पर एक विज्ञापन चिपका हुआ था- कुछ दिन पहले कोई इस दुकान पर अपना सामान भूल गया। कृपया उसका नाम और रंग बताकर मुझसे ले जाएं।

यह विज्ञापन पढ़कर कई लोग झूठा दावा करने भी आए लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। आज मैं फिर से पक्का इरादा कर चुका था कि इस बार उसे साफ कह दूंगा कि यह कोट मैं तुम्हारे लिए लाया हूं। जो होगा देखा जाएगा। मैंने गहरी सांस ली और पूरी ताकत बटोर कर कहा, मिस तान्या, आप बहुत मेहनती लड़की हैं। आप अपनी त्वचा की इस बीमारी का इलाज क्यों नहीं करवा लेतीं?

शुक्रिया सर, मैं खुद भी एक अच्छे डॉक्टर की तलाश में हूं। थोड़े पैसे इकट्ठे होने के बाद मैं इस बारे में गंभीरता से सोचूंगी। वैसे, आपको भी अपनी सेहत के बारे में सोचना चाहिए। आज आप चौथी बार चाय पी रहे हैं। यह आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है। आप सिर्फ दो बार चाय पीया कीजिए।

जी जरूर। कल से सिर्फ दो बार पीऊंगा। ... और मैं घर आ गया।

उस रात मैंने डॉक्टर साहब से पूछा, सर, अगर मेरी त्वचा पर सफेद दाग जैसी बीमारी हो जाए तो आप मुझे कौनसी दवा देंगे?

उन्होंने अपने गोल चश्मे से मेरी ओर देखते हुए कहा, लेकिन बेटे, तुम तो मुझे पूरी तरह फिट नजर आते हो। तुम्हें कोई दिक्कत तो नहीं है ना?

जी नहीं, बस, यूं ही पूछ रहा था। एक बार मेरे किसी दोस्त को यह बीमारी हो गई थी। आज उसकी याद आ गई तो आपसे पूछ लिया।

ओके, कोई बात नहीं। इसका इलाज काफी लंबा चलता है। हमारे पास इसकी दो दवाएं हैं। एक खाने की और दूसरी मालिश की। उन्होंने मुझे उस दवा की पूरी जानकारी दी। वे यह बताना भी नहीं भूले कि इस मर्ज में कौनसी चीजों से परहेज रखना चाहिए। मैंने बाद में पूरी जानकारी एक कागज पर नोट कर ली।

अगली शाम मैंने वह दवा एक कागज की पुड़िया में पैक की। मैं जल्द चाय की दुकान पर पहुंचना चाहता था। आज यहां भीड़ कम थी। मैंने देखा, मेरा कोट अब भी दुकान में रखा हुआ था। चाय पीने के बाद मैंने पैसे उसकी ओर बढ़ाए और कहा, मिस तान्या, मैं एक भले डॉक्टर को जानता हूं। वे आपकी इस बीमारी की बहुत अच्छी दवा कर सकते हैं। आप कुछ दिनों तक यह दवा लीजिए। अगर आपको फायदा हो तो मैं और लाकर दे दूंगा।

जी बहुत शुक्रिया। ईश्वर आपको सलामत रखे।

उसने मुझसे दवा ले ली। आज उसने मुझसे चाय के पैसे भी नहीं लिए। लौटते वक्त मैं कुछ देर के लिए उस चर्च में भी रुका जिसके एक पादरी ने कभी वह बेंच लगवाई थी। मैंने वहां के सबसे बड़े पादरी से निवेदन किया कि वह उस भली लड़की के लिए जरूर प्रार्थना करे जिसके चेहरे पर सफेद दाग हैं। अगर संभव हो तो ईश्वर से यह भी कहें कि वह जल्द उसे एक कोट लाकर दे।

इसी सिलसिले में करीब एक महीना बीत गया। मैंने तान्या से पूछा तो मालूम हुआ कि मेरी दवा से उसे काफी फायदा हुआ है। अगर वह छह महीने तक लगातार यही दवा लेगी तो शायद उसकी बीमारी पूरी तरह ठीक हो जाएगी। मैंने उसे भरोसा दिलाया कि कल दवा की दूसरी पुड़िया लाकर दे दूंगा।

अगली सुबह डॉक्टर साहब मेरे कमरे में आए और मुझे तुरंत तैयार होने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि आज एक बहुत जरूरी काम के लिए हमें बाहर जाना होगा, जिसमें मुझे भी साथ रहना है। मुझे याद आया, आज तो मुझे भी तान्या को दवा की दूसरी खुराक देने जाना है। अगर मैं बाहर गया तो दवा देने कौन जाएगा? यह सोचकर मैं पूरी तरह निराश हो गया था।

हम दोनों घर से पैदल ही निकले। पूरे रास्ते डॉक्टर साहब बोलते रहे और मुझसे मेरी हैंडराइटिंग क्लास के बारे में पूछते रहे। उन्होंने सुझाव दिया कि मुझे अंग्रेजी के साथ रूसी भाषा में भी क्लास शुरू करनी चाहिए। फिर उन्होंने कहा, चलो, आज मैं तुम्हें गर्मागर्म मीठी चाय पिलाता हूं। मुझे यकीन है कि यह चाय तुम्हें जरूर पसंद आएगी।

ठीक है। चलिए - मैंने कहा।

थोड़ी ही देर में हम दोनों उस बेंच तक पहुंच गए जहां मैं कई कप चाय अब तक गटक चुका था। हम वहां बैठे तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। आज तान्या ने मेरा वह कोट पहना था जिसके लिए मैंने सबसे प्यारी गुल्लक फोड़ दी थी। उस रात का वह निशान मेरी नाक पर अब भी मौजूद था।

डॉक्टर साहब ने ऑर्डर दिया, हैलो मिस। हमारे लिए दो कप चाय लाइए।

जी, सर जरूर। और वह दो कप चाय लेकर हाजिर हुई। उसने आते ही मुझे नए कोट के लिए धन्यवाद कहा।

मैंने पूछा, लेकिन आप कैसे जानती हैं कि यह कोट मेरा ही है? मेरे पास इसका कोई प्रमाण भी नहीं है।

तब डॉक्टर साहब बोले, तुम्हें प्रमाण की कोई जरूरत भी नहीं है। जिस दिन तुम्हारी गुल्लक के टुकड़े बाहर पड़े थे, तभी मुझे तुम पर शक हुआ। फिर तुम्हारी सूजी हुई नाक और बोतल में सफेद दाग की दवा का कम हो जाना किसी प्रमाण से कम नहीं है। इसलिए मैंने फैसला किया कि तान्या से जरूर मिलूंगा। मैंने ही इससे कहा कि वह तुम्हें ज्यादा चाय पीने से रोके। इस मौके पर मैं तुम्हें दो तोहफे देना चाहता हूं।

यह कहकर उन्होंने अपने बैग से मेरे लिए एक ऊनी कोट और रुपयों से पूरी भरी एक गुल्लक निकाली और मुझे थमा दी। उन्होंने कहा, मेरे बच्चे, मैं तुमसे बहुत खुश हूं। मैं तान्या की बीमारी का मुफ्त में इलाज करूंगा और बहुत जल्द इसे अच्छी कर दूंगा।

मैं इस भली लड़की की आर्थिक मदद भी करूंगा। इस खुशी के मौके पर मैं भी तुम दोनों के साथ शामिल होना चाहता हूं। यह कहकर उन्होंने मुझे गले से लगा लिया। आज बेंच पर लिखे उन शब्दों को मुझसे बेहतर और कोई नहीं समझ सकता था। यह एक नई सुबह का उजाला था जिसमें वे शब्द कुछ ज्यादा चमक रहे थे।

राजीव शर्मा 
कोलसिया 

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