ये अंधों का शहर है गुरुशरण, तुम चिराग बांटते क्यों मर गए?


राजस्थान में पूर्णतः शराबबंदी की मांग को लेकर 32 दिनों से अनशन कर रहे पूर्व विधायक गुरुशरण छाबड़ा का देहांत हो गया। मुझे आश्चर्य होता है, इस जमाने में कोई शराबबंदी की मांग कैसे कर सकता है! यह तो आरक्षण, मंदिर-मस्जिद और गोश्त के नाम पर सियासत चमकाने का दौर है।

ऐसे में किसी ने शराबबंदी की मांग ही क्यों की? यकीनन ऐसे शख्स की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी और वह मेरे लिए, आपके लिए और सबके लिए भूख से मर गया।

मौत के बाद जहां परिजनों ने उनकी देह मेडिकल छात्रों के अध्ययन के लिए दान कर दी, वहीं यह मौत अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई। सबसे बड़ा सवाल है- क्या भारत में कभी पूर्णतः शराबबंदी हो सकती है? इस सवाल का जवाब चाहे जो हो लेकिन हकीकत यही है कि शराब ने कई घरों को उजाड़ा है, इसकी बोतल ने कई परिवार तबाह किए हैं।

मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जिन्होंने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई शराब की दुकान में भेंट कर दी। उनके घर में चूल्हा भले ही न जले लेकिन बोतल का ढक्कन जरूर खुलता है। शराब को लेकर एक कहानी मैं भूला नहीं हूं जो मैंने कहीं पढ़ी थी। हो सकता है कि इसे पेश करने में कुछ कमी रह जाए। अगर रहे तो आप बताइए।

एक व्यक्ति के सामने तीन में से कोई एक गुनाह करने का प्रस्ताव रखा गया। पहला, किसी की हत्या करो। दूसरा, किसी औरत के साथ दुष्कर्म करो और तीसरा, शराब पीओ।

उस व्यक्ति ने कहा, मैं एक सभ्य मनुष्य हूं। किसी औरत के बारे में गलत सोच भी नहीं सकता और किसी व्यक्ति की हत्या का तो सवाल ही नहीं उठता। अगर मुझे इन तीनों में से कोई एक गुनाह करना हो तो मैं तीसरा गुनाह करना चाहूंगा। मैं शराब पी लूंगा और कुछ ही देर बाद इसका नशा उतर जाएगा।

उसने शराब पी। जब नशा गहराने लगा तो उसने औरत के साथ बदतमीजी शुरू की। यह देखकर एक शख्स उसे बचाने आया। इस दौरान शराब अपना असर दिखाने लगी। उसने न केवल उस व्यक्ति की हत्या की बल्कि औरत के साथ दुष्कर्म भी किया। नशा उतरने के बाद उसने देखा, जिन दो गुनाहों से वह बचना चाहता था, शराब पीने के बाद सबसे पहले उन्हें ही अंजाम दिया।

सवाल फिर वही आता है कि शराब पर पाबंदी क्यों नहीं लगनी चाहिए? यह न केवल स्वास्थ्य, चरित्र और धन का नुकसान करती है बल्कि इसका सबसे ज्यादा खामियाजा शराबी इन्सान की पत्नी और उसके बच्चों को भुगतना पड़ता है।

मुझे बहुत आश्चर्य होता है, जब कुछ लोग शराब पीने में शान समझकर कहते हैं - शराब तो एक दवा है। इसे दवा की तरह पीओ, फिर यह कोई नुकसान नहीं करती। मैं इन लोगों से पूछना चाहता हूं - मान लिया कि शराब एक दवा है।

हमने दवा की कमी से इन्सानों को मरते देखा है, फिर ऐसे लोग क्यों नहीं मरते जो शराब नहीं पीते? हमने आज तक न तो ऐसा पढ़ा और न सुना कि कोई व्यक्ति इसलिए मर गया कि उस बेचारे को पीने के लिए शराब नहीं मिली!

असल में लोग शराब पीने के लिए बहाना ढूंढते हैं। पीने वाले थकान के नाम पर, मन हल्का करने के लिए और यहां तक कि पड़ोसी के दूर के रिश्तेदार की दादी मरने के गम में भी शराब पी लेते हैं। उन्हें सिर्फ एक बहाना चाहिए होता है।

शराब एक बुराई है और अच्छी शराब या बुरी शराब जैसी कोई चीज नहीं होती। मेरा मानना है कि देश में पूर्णतः शराबबंदी होनी चाहिए। और सिर्फ शराब ही नहीं गांजा और भांग पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए लेकिन यह बहुत मुश्किल है।

गांजा-भांग पर प्रतिबंध लगाने की बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इन दो चीजों का नशा शराब से भी बुरा है। मैंने मेरे गांव में ऐसे कई लोग देखें हैं जिनकी सुबह की शुरुआत गांजे की चिलम से होती है और हर शाम भांग से रंगीन। दिनभर उनकी आंखें लाल रहती हैं। उनकी हालत भी किसी शराबी से कम नहीं होती।

शराब से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है, नेताओं और अफसरों की जेबें भरती हैं इसलिए इस पर प्रतिबंध लगना बहुत कठिन है। अगर प्रतिबंध लग भी गया तो लोग घरों में शराब बनाने लगेंगे। कहां तक किसी को रोक पाएंगे?

जो शख्स यह ठान चुका है कि उसे शराब पीकर बर्बाद होना है, उसे कोई नहीं बचा सकता। इसके लिए कुछ उपाय लागू किए जा सकते हैं - जैसे शराब की कीमत में अत्यधिक वृद्धि, आदतन शराबी कर्मचारी का 90 फीसदी वेतन उसके मां-बाप या पत्नी के बैंक अकाउंट में जमा होना, शराब पीकर गाड़ी चलाने पर सार्वजिक स्थानों पर एक महीने तक सफाई करने की सजा, खुले आम शराब पीने पर सख्त सजा जैसे नियम लागू कर शराब के सेवन को काफी हद तक हतोत्साहित किया जा सकता है।

मैं नहीं जानता कि जितनी बातें ऊपर लिख चुका हूं उनका कोई खास असर होगा। हां, जो लोग शराब नहीं पीते उनका इरादा मजबूत हो सकता है कि वे अपने संकल्प पर कायम रहें क्योंकि शराब जो गुनाह करवा दे वह कम है।

बहुत कम लोग जानते होंगे कि जिस बादशाह औरंगजेब को लोग उसकी मौत के बाद भी आए दिन खरी-खोटी सुनाते हैं उसके शासन में न केवल शराब पर प्रतिबंध था बल्कि भांग और गांजा पर भी पूर्णतः रोक थी।

बात किसी बादशाह की नहीं है। असल मुद्दा है इच्छाशक्ति का। हमारे शासक शराबबंदी की इच्छा ही नहीं रखते। अगर उनमें तनिक भी आत्मबल होता तो वे छाबड़ा की मौत के बाद एक दूसरे पर आरोप नहीं लगाते बल्कि उनके नाम से शराब विरोधी सख्त कानून बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते।

छाबड़ा ने किसी जाति के लिए आरक्षण नहीं मांगा, अगर मांगते तो शायद उनके पीछे भीड़ लग जाती, उन्हें मंदिर-मस्जिद नहीं चाहिए थे, अगर वे मांगते तो लोग अपने सौ काम छोड़कर मरने-मारने को तैयार हो जाते, वे कोई अन्ना या रामदेव नहीं थे, अगर होते तो सरकार उनके सामने नतमस्तक हो जाती।

वे गांधी भी नहीं थे लेकिन उनके कदमों पर चलने का उन्होंने इरादा जरूर किया था। शायद इसीलिए उनका भी वही हश्र हुआ जो गांधी का हुआ था। मैंने किसी नेता को लोगों के लिए मरते नहीं देखा। तुम तो मुफ्त में मारे गए गुरुशरण। क्यों अंधों के शहर में चिराग बांटने निकले थे? देखता हूं, अब कितने साहित्यकार अपने अवाॅर्ड वापस लौटाते हैं।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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