जब मुहम्मद साहब (सल्ल.) के इन्साफ से टल गया अरब की धरती से एक विनाश


पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) एक एेसा नाम हैं जिनका असर सिर्फ अरब की धरती पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर हुअा। जिन लोगों ने सही नजरिए से उनके बारे में जानने की कोशिश की, उनके दिलों में पैगम्बर साहब (सल्ल.) का स्थान आैर भी ऊंचा हो गया लेकिन जिन्होंने किसी गलत जरिए या गलत नजरिए से उनके बारे में पढ़ा, सुना या समझा, उनके हाथ सिवाय नफरत के आैर कुछ नहीं लगा।

आज जिस इंटरनेट को हम ज्ञान का सबसे बड़ा आैर सहज माध्यम समझते हैं वहां अफवाहों का बाजार भी बहुत गर्म है। अगर आप लिखना जानते हैं तो एेसी बातें लिखिए जो लोगों में मुहब्बत आैर भार्इचारा पैदा करें।

इन्सान किससे बड़ा होता है? वह न तो किसी देवता का अश्लील चित्र बनाने से बड़ा होता है आैर न किसी पैगम्बर का कार्टून बनाने से। वह बड़ा होता है बड़े की बड़ार्इ करने से आैर उसकी खूबियों को अपनाने से। नफरत का जहर जितना जल्दी फैलता है वह उतनी ही तेजी से फैलाने वाले को खत्म भी करता है।

मेरी आज की यह पोस्ट पैगम्बर साहब (सल्ल.) के महान जीवन की एक घटना से जुड़ी है। मैं इस इरादे के साथ इसे यहां प्रकाशित कर रहा हूं कि नेक लोग हर देश आैर हर धर्म में पैदा हुए हैं। हमें उनकी इज्जत करनी चाहिए।

हमारा दिल इतना छोटा भी नहीं होना चाहिए कि उसमें किसी आैर के लिए जगह ही न बचे, क्योंकि एेसे दिल में न खुद के लिए जगह बचती है आैर न खुदा के लिए।

(यह कहानी मैंने कुछ साल पहले एक किताब में पढ़ी थी। उसमें बतार्इ गर्इ घटना को आैर आसान शब्दों में पेश कर रहा हूं )

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पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) यानी अमन, भाईचारा, सद्भाव और शांति के महान दूत। एक बार उन्हें (यह उनके पैगंबर होने के ऐलान से पहले की बात है) किसी फैसले की जिम्मेदारी सौंपी गर्इ आैर उसके लिए उन्होंने एेसा इन्साफ किया कि आज तक वहां के लोग यह घटना भूले नहीं हैं।

उन्होंने अपने एक खास फैसले से अरब निवासियों को भयंकर युद्ध से बचा लिया था। काबा में एक पवित्र पत्थर से संबंधित फैसला अगर उन पर नहीं छोड़ा जाता तो भयंकर लड़ाई छिड़ती जो कई लोगों का विनाश कर देती, लेकिन मुहम्मद साहब (सल्ल.) की सूझबूझ, विवेक और न्यायप्रियता से ऐसी नौबत नहीं आई।

मक्का शहर के चारों ओर पहाड़ हैं और बीच में काबा (तीर्थ-स्थल) है। एक बार बहुत तेज बरसात हुई। पहाड़ों से पानी आया और शहर में दाखिल हो गया। पानी ने बाढ़ की शक्ली ले ली और उसने काफी विनाश किया।

बड़ी-बड़ी इमारतें ढह गईं। पानी काबा के भीतर भी पहुंच गया। मक्का वालों को फिक्र हुई। लोग यहां दूर-दूर से आते थे। काबा की इमारत में पानी जाने से यह जरूरी हो गया कि अब नया निर्माण किया जाए लेकिन लोग डर रहे थे।

नए निर्माण के लिए जरूरी था कि पुरानी इमारत को कई जगहों से हटाया जाए। इसे लेकर लोगाें में भय था।

बाढ़ की वजह से इमारत को काफी नुकसान हो गया। नींव में पानी जाने से वह कई जगहों से हिलने लगी थी। अभी एक समस्या और थी। नई इमारत और मजबूत होनी चाहिए।

इसके लिए जरूरी था नया सामान और एक अच्छा कारीगर। ऐसा कारीगर कहां मिले जो काबा की नई इमारत को बहुत कुशलता से बना सके?

उन्हीं दिनों की बात है। एक आदमी मिस्र से जहाज लेकर चला था लेकिन उसका जहाज समुद्र के तट से टकराकर क्षतिग्रस्त हो गया था। जहाज में इमारत बनाने का सामान था और जहाज का वह मालिक खुद एक बहुत कुशल कारीगर था। तभी मक्का के लोगों को इसकी खबर मिली।

तुरंत कई आदमी आए और उसके सामने काबा की इमारत के निर्माण का प्रस्ताव रखा। उस व्यक्ति ने प्रस्ताव मान लिया। उसका नाम बाकूम था। बाकूम ने काबा की पुरानी इमारत देखी और कहा, नई इमारत ऐसी बनेगी कि आंधी के झोंके आएं या बाढ़ के थपेड़े, यह सबसे सुरक्षित रहेगी, मगर अभी पुरानी समस्या बरकरार थी।

नई इमारत बनाने के लिए जरूरी था कि पुरानी के कुछ हिस्से अलग किए जाएं। आखिरकार वलीद-बिन मुगीरा नाम का एक व्यक्ति आया और उसने डरते-डरते एक खंबा अलग किया। लोगों में भय था। न जाने वलीद के साथ अब क्या हो?

दिन ढल गया और रात हो गई। अब लोग इस बात को लेकर आशंकित थे कि वलीद के साथ क्या हुआ परंतु वलीद सुरक्षित था। लोग अब समझ चुके थे कि असल में वे काबा की इमारत को नुकसान नहीं पहुंचा रहे, वे तो नवनिर्माण की एक प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं।

धीरे-धीरे कई लोग काम में जुटे और इमारत तैयार होने लगी। करीब ही जो पहाड़ियां हैं, वहां से लोग पत्थर लेकर आए और उधर कारीगर अपने काम में जुटा था।

देखते ही देखते इमारत तैयार हो गई लेकिन अभी चुनौतियां समाप्त नहीं हुई थीं। काबा की पुरानी दीवार में पूर्व दिशा की ओर एक काला पत्थर था। यह अब भी है। इसे हजरे-असवद कहा जाता है। इसे बहुत बरकत वाला समझा जाता है। काबा का तवाफ (परिक्रमा) करते हैं तो हर तवाफ उसी पत्थर से शुरू करते हैं।

दीवारें बनने के बाद सवाल था कि हजरे-असवद को वहां कौन रखे? इसे रखने का सौभाग्य किसे हासिल हो? कोई भी कबीला ऐसा नहीं था जो खुद को यह मौका हासिल करने से रोक सके। हर कोई दूसरों के मुकाबले खुद को इसका हकदार समझता था।

अब हंगामा हो गया और हालात बिगड़ गए। कल तक जो लोग कंधे से कंधा मिलाकर जुटे थे, आज उनमें झगड़ा शुरू हो गया। नफरत की आग सुलगने लगी थी। पांच रातें बीत गईं पर हंगामा खत्म नहीं हुआ, कोई समाधान नहीं निकला। हालात मुश्किल थे।

कुछ कबीलों ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि यह सौभाग्य अगर हमें नहीं मिला तो किसी और को भी हासिल नहीं होने देंगे। उस जमाने में अरब लोगों के बीच एक रिवाज और था।

जब वे युद्ध में जान लेने या देने की कसम खाते तो सबसे पहले एक प्याला लेते। उसमें खून भरते और जिस व्यक्ति को कसम लेनी होती, वह आकर खून भरे प्याले में हाथ डुबोकर कसम खाता। इस मौके पर कई लोग आए।

उन्होंने प्याले में हाथ डुबोकर कसम खाई। चमचमाती तलवारें म्यानों से बाहर आ गईं। तभी कुरैश का एक सबसे बूढ़ा और अनुभवी आदमी आया।

उसका नाम अबू-उमय्या-बिन-मुगीरा था। उसने कहा, इज्जत और रुतबे में तुम सब बराबर हो। सबका पद समान है। नफरत और बैर की आग मत भड़काओ। इससे नुकसान के अलावा और कुछ हासिल नहीं होगा। अक्ल और होश से काम लो। मेरी एक बात मानो।

उसने कहा, काबा के चारों ओर हरम शरीफ की चारदीवारी है। उसके एक दरवाजे का नाम है बाबुस्सफा। जो पहला कुरैशी बाबुस्सफा से दाखिल होकर आए, इस झगड़े का फैसला तुम लोग उसी पर छोड़ दो।

लोगों को उस बुजुर्ग की यह बात पसंद आई और उन्होंने इससे सहमति जता दी। सबने निगाहें उसी दरवाजे की ओर गड़ा दीं और इंतजार करने लगे। देखें, उनकी किस्मत का फैसला किसके हाथ में जाता है? तभी उस दरवाजे से एक खूबसूरत नौजवान दाखिल हुआ।

वे मुहम्मद (सल्ल.) थे। लोगों ने अपनी समस्या उन्हें बताई। सबको उनकी सत्यता पर भरोसा था। उनका फैसला सबको मंजूर भी था। उन्होंने फरमाया- एक कपड़ा लाइए।

तुरंत एक कपड़ा लाया गया। आपने हजरे-असवद को उस पर रखा और फरमाया- हर कबीले का सरदार एक-एक कोना पकड़ ले और सब मिलकर उठाएं। कबीलों के सरदारों ने कपड़े का कोना पकड़ा और हजरे-असवद को उस जगह ले गए जहां उसे ले जाना था।

फिर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने उसे उठाया और उसकी जगह रख दिया। लोगों में खुशी की एक लहर दौड़ गई। तलवारें वापस म्यानों में चली गईं। सब लोग आपके इस फैसले की दिल से तारीफ कर रहे थे। कहां तो लोग खून के प्याले में हाथ डुबोकर कसमें खा रहे थे और कहां आपने इतनी बड़ी समस्या आसानी से हल कर दी।

अगर उस दिन हजरे-असवद का यह फैसला मुहम्मद साहब (सल्ल.) पर नहीं छोड़ा जाता तो अरब क्षेत्र में ऐसी भयंकर जंग छिड़ती जो न जाने कितने लोगों के घर उजाड़ती और कितने ही लोग काल के ग्रास बन जाते।

उस जमाने में भी युद्ध बहुत भयानक होते थे। कई लड़ाइयां तो वर्षों तक चलती थीं। कहा जाता है कि एक कबीले का ऊंट अगर दूसरे कबीले में घुस जाता तो 40 साल तक लोगों में जंग चलती। कर्इ लोगों को तो यह बात भी मालूम नहीं होती कि वे क्यों लड़ रहे हैं। वे सिर्फ इसलिए लड़ते क्योंकि उनके पूर्वजों ने वह लड़ार्इ शुरू की थी।

यह मुहम्मद साहब (सल्ल.) की सूझबूझ, न्यायप्रियता और विवेकशीलता थी कि वे लोग एक भयंकर युद्ध से बच गए।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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Comments

  1. Subhaan Allah . Islaam ek aman-chain pasand mazhab h

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  2. Subhan allah ..islam ek bahut hi accha aur saccha mazhab hai

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  3. per ek swal sange sawad to jannat se aaya tha .aisa log kahte hain ...

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