मैंने मुहब्बत तुमसे की है तो मौत से डरना कैसा


जब से मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया है, मेरे कई दोस्त बन गए हैं। उनके साथ मेरा जुड़ाव सिर्फ इंटरनेट के जरिए है। मैंने उन्हें अब तक देखा नहीं, फिर भी उनसे दोस्ती का एक भावनापूर्ण रिश्ता बन गया है।

कुछ दिनों पहले मेरा ब्लाॅग पढ़ने के बाद मास्को में रहने वाले एक दोस्त को भरोसा हो गया कि मैं नास्तिक हो सकता हूं। यह उनका एक अनुमान था आैर जब मैंने उन्हें हकीकत बताई तो यह गलत निकला।

इस बात पर वे बेहद निराश भी हैं। उनका मानना है कि दुनिया में रहस्यों की संख्या बहुत ज्यादा है। जिस दिन दुनिया का आखिरी रहस्य सुलझा लिया जाएगा, उसी दिन हर गली-चौराहे पर नास्तिक लोगाें की संख्या ज्यादा दिखाई देगी।

उनके मुताबिक उस दिन का आगमन उतना ही निश्चित है जितना कि इस साल रूस में कड़क सर्दी पड़ना। मैं जानता हूं वह दिन इस धरती पर कभी नहीं आएगा जब दुनिया का आखिरी रहस्य सुलझा लिया जाएगा, लेकिन रहस्यों से जुड़ी उनकी विचारधारा जानने के बाद मैंने खुद से जुड़े रहस्यों पर गौर किया।

मैं मानता हूं कि हर शख्स की जिंदगी का एक भाग रहस्य के कोहरे में छुपा होता है। अक्सर ऐसे कई रहस्य हम भूल भी जाते हैं और जो याद रहते हैं उनका जिक्र करना पसंद नहीं करते।

इस पोस्ट के जरिए मैं आपकाे मेरे एक रहस्य के बारे में बताना चाहूंगा। यह मेरी जिंदगी का है आैर एक एेसी जगह से जुड़ा है जिसे बहुत कम लोग देखना पसंद करते हैं मगर मुझे उससे बहुत लगाव है।

अगर आप इस पंक्ति को पढ़ रहे हैं तो लंदन या कश्मीर की कल्पना मत कीजिए, क्योंकि ये मेरी सूची में शामिल नहीं हैं। आपको यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि मुझे कब्रिस्तान आैर श्मशान बहुत पसंद हैं।

इस नजरिए से नहीं कि वे तफरीह की जगह हैं बल्कि इसलिए कि वे हमें आर्इना दिखाते हैं आैर गुनाहों से बचने की नसीहत देते हैं। हिंदू धर्म में शिवजी का इसीलिए श्मशान से खास लगाव दिखाया गया है क्योंकि वे भी हमें एक खास सबक देना चाहते हैं।

वो सबक है- जिंदगी में अच्छार्इ से मुहब्बत रखो लेकिन मौत को कभी मत भूलो। यही वो लम्हा है जब सभी लोग अपने रब की आेर लौटाए जाएंगे।

जीवनभर तमाम नफा-नुकसान के गणित में उलझा इन्सान यहां आकर सिर्फ आराम करता है, उसके पास कोर्इ काम नहीं होता। यहां उसकी काबिलियत सिर्फ नेकी होती है।

रब के सामने आराम कर रहे बंदे यूं तो यहां सब बराबर हो जाते हैं, लेकिन उनके नेक काम जिंदा रहते हैं। यहां दुनिया के सभी बंधन, विवाद और शिकवे-शिकायत हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं।

असल में यह लौकिक यात्रा की रेलगाड़ी का अंतिम स्टेशन है जहां खुशी, उल्लास और भरपूर शांति है। कुछ लोग मानते हैं कि कब्रिस्तान या श्मशान में भूत होते हैं, मगर मेरा कभी उनसे सामना नहीं हुआ। कुछ साल पहले मैं रोज वहां कबूतरों को दाना डालने जाता था।

इस जिंदगी के बाद क्या होगा, यह सवाल मेरे लिए आज भी एक पहेली है, मगर कुछ दिनों पहले कुरआन की एक आयत तथा गीता का एक खास श्लोक पढ़ने के बाद मेरा विश्वास और मजबूत हो गया है कि मौत ही जिंदगी का अंत नहीं है। ईसा मसीह भी इस सच पर भरोसा जताते थे। वे तो मौत के बाद जिंदा भी कर दिए गए आैर स्वर्ग चले गए। इस बात ने मुझमें नई ऊर्जा भर दी है।

जीवन हमेशा के लिए है। इसकी किताब का कोई आखिरी पन्ना नहीं है। अब मुझे उस दिन का बेसब्री से इंतजार है जब एक लम्बी यात्रा पर जाने से पहले मुझे भी ‘आराम’ करना होगा। मगर अभी बहुत काम बाकी है आैर मैं जल्दी सोना नहीं चाहता।

इस वक्त बिजली गुल है आैर रात बहुत ठंडी। मैं मोमबत्ती की रोशनी में यह डायरी लिख रहा हूं। मैं हिसाब लगाता हूं, मुझे अगले दो साल तक बिल्कुल भी फुर्सत नहीं है। अभी इतना समय मेरे लिए पर्याप्त है। सचमुच ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है।

जब मैं देर रात को घर लौटता हूं तो सफर के दौरान कर्इ सवाल मेरे दिमाग में आते हैं। मेरे रास्ते में दो श्मशान घाट हैं। उनके सामने अक्सर ही लोगों की भीड़ होती है। यहां कभी अवकाश नहीं होता।

उन्हें देखकर मेरा विचार आैर मजबूत हो रहा है कि जब तक यहां हैं, हमें नेक काम में देरी नहीं करनी चाहिए, बल्कि खुद में एेसी काबिलियत पैदा करनी चाहिए कि रब की दुनिया आैर अच्छी जगह बन जाए। फसाद आैर बिगाड़ का सिलसिला बंद होना चाहिए।

बेमतलब के सवालों में मत उलझिए, क्योंकि वक्त गुजरता जा रहा है। कोर्इ किस पंथ को मानता या नहीं मानता है, यह तय करने में माथा मत लगाइए। आप खुद क्या कर रहे हैं, इस पर ध्यान दीजिए। यही आपका रिपोर्ट कार्ड है।

दुनिया में शहंशाहों के कदमों से बने निशान भी मिट गए हैं इसलिए यहां कदम जमाकर बैठने की भूल मत कीजिए, क्योंकि स्टेशन पर रेलगाड़ी बस आने को है इसलिए नेकी का टिकट अपने पास रखिए। जिसने नेकियों के बजाय सिर्फ माल-असबाब कमाने में ही जिंदगी बिता दी, उसने एक एेसा बाेझ कमा लिया जिसे रब के घर में ले जाने की बिल्कुल भी इजाजत नहीं है। मैंने मुहब्बत रब से की है ताे मौत से डरना कैसा?

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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