सावधान रहें, क्योंकि कोर्इ आपकी कब्र पर चूल्हा जलाना चाहता है... होशियार रहें, कोर्इ आपकी चिता पर रोटी सेकना चाहता है

इस कहानी को पढ़ने में जल्दबाजी न करें। यह भारत आैर अफगानिस्तान जैसे कुछ देशों पर आधारित है। इसमें मैंने यह बताने की कोशिश की है कि आज हम कुरआन आैर गीता के पैगाम को भूल गए हैं, इसलिए हमें अल्लाह या भगवान को दोषी ठहराने का कोर्इ हक नहीं है। दुनिया के बद से बदतर हालात के लिए इन्सान दोषी है आैर वह चाहे तो उन्हें बेहतर भी कर सकता है।

कुरआन आैर गीता में कहीं भी आतंकवाद का समर्थन नहीं किया गया है। ये दोनों किताबें शांति आैर भार्इचारे का संदेश देती हैं, लेकिन कुछ चालाक किस्म के लोग हमें बेवकूफ बनाते हैं आैर अपने खोटे मंसूबे पूरे करने के लिए इन पवित्र किताबें का हवाला देते हैं। हमें एेसे लोगों से बचना चाहिए। सावधान रहिए, क्योंकि कोर्इ आपकी कब्र पर चूल्हा जलाना चाहता है। होशियार रहिए, कोर्इ आपकी चिता पर रोटी सेंकना चाहता है। अब आप यह कहानी पढ़िए, मैं जाता हूं...

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- बेगुनाह का गोश्त -
यह मुल्क कौनसा है, मैं नहीं जानता। मेरा नाम भी मुझे मालूम नहीं। मेरा मजहब क्या है, यह मैं अब तक नहीं जान सका हूं। एक सवाल मैं खुद से बहुत बार पूछ चुका हूं कि यह साल कौनसा है, लेकिन यह भी मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता।

मेरे पड़ोस में एक आदमी रहता है जिसे मैं रहीम चाचा कहता हूं। जिसका नाम ही रहीम है वह शख्स यकीनन बहुत रहम वाला होगा, ऐसा मैं सोचता था। लोग उन्हें बहुत बड़ा मजहबी जानकार मानते हैं।

उन्होंने बताया कि यह साल 2014 चल रहा है। मेरा एक मजहब भी है और लोग मुझे मुसलमान कहते हैं। मुल्क के तौर पर मुझे पूरी आजादी है कि मैं अफगानिस्तान, सीरिया, इराक या पाकिस्तान में से किसी एक का नाम चुन लूं, क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, सब जगह एक जैसे ही हालात हैं।

रहीम चाचा बुजुर्ग हैं। उनकी दाढ़ी सफेद हो चुकी है। वे दावा करते हैं कि उन्हें पूरी कुरआन याद है, लेकिन वे उस पर कितना अमल करते हैं, यह कोर्इ नहीं जानता।

उनकी खासी इज्जत है। हालांकि उनके परिवार में बहुत झगड़े हैं और उनका बड़ा लड़का दूसरे देश चला गया। चाचा ने यह कसम खाई है कि वे पूरी दुनिया से हर एक काफिर को खत्म कर देंगे। भूख आैर गरीबी वे कब खत्म करेंगे, इस पर कभी बात नहीं करते।

चाचा ने इराक और सीरिया में भारी प्रलय मचाया है। उनकी इस जंग में कई मासूम मुसलमान भी मारे गए हैं लेकिन चाचा को उनका कोई अफसोस नहीं है।

वे एक ऐसे मुल्क का सपना देख रहे हैं जहां हर शख्स को कुरआन पढ़ना अनिवार्य होगा लेकिन उसका मतलब वही मानना होगा जो चाचा को मंजूर है। अलग मतलब निकालने वाले फांसी पर टांग दिए जाएंगे।

एक दिन मैं चाचा के घर गया। मालूम हुआ कि वे अफगानिस्तान की एक बस्ती पर बम बरसाने गए हैं। कमरे में चाचा का एक थैला टंगा था। थैले में कुछ जेहादी साहित्य, गोलियां, बम बनाने की विधियों वाली किताब और कुरआन पाक की एक प्रति भी रखी हुई थी।

मैंने थैले से कुरआन निकाल ली और वहीं बैठकर पढ़ने लगा। मुझे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि उसके पहले से लेकर आखिरी पन्ने तक एक भी लफ्ज ऐसा नहीं जो इस मार-काट को जायज ठहराए।

उसमें लिखा था - जिसने एक भी बेगुनाह को कत्ल किया तो समझो उसने पूरी इन्सानियत को कत्ल कर दिया। उसे अल्लाह कभी माफ नहीं करेगा।

… अब मेरा मुल्क बदल गया है। यह हिंदुस्तान है और यहां भी ज्यादा अच्छे हालात नहीं हैं। शुक्र है कि मैं अब भी इन्सान हूं, लेकिन आप पूरे भरोसे के साथ मुझसे इन्सानियत की उम्मीद मत कीजिए।

मेरे एक पड़ोसी बहुत बड़े विद्वान हैं। सब लोग उन्हें ज्ञानी बाबा कहते हैं। एक बुजुर्ग ने मुझे बताया कि उनका असल नाम पंडित प्रभुदयाल है। शायद इसका मतलब है - प्रभु की दया से मिला हुआ।

मुझे पूरा विश्वास था कि जिसके नाम में ही प्रभु है उसमें प्रभु जितनी दया जरूर होगी। उनके पंचांग के मुताबिक यहां भी वही साल है जो अफगानिस्तान, इराक और दुनिया के दूसरे हिस्सों में चल रहा है।

वे सिर्फ बड़े और अमीर लोगों से ही मिलना पसंद करते हैं। वे दाढ़ी नहीं रखते। यहां भी मेरा एक मजहब है और लोग मुझे हिंदू कहते हैं क्योंकि मुझे ऐसा होना ही चाहिए।

पंडित प्रभुदयाल को सभी धार्मिक ग्रंथ कंठस्थ हैं। उनका सपना है कि पूरा हिंदुस्तान और पूरी दुनिया एक ही धार्मिक ग्रंथ और पंथ के मुताबिक चले। उन्हें इस बात से बड़ा ऐतराज है कि मैं शिरडी के एक बूढ़े फकीर के यहां क्यों जाता हूं।

उनके मुताबिक यह मेरे धर्म के खिलाफ है। उनका दावा है कि वे बिल्कुल सही भविष्य जानते हैं। वे मिट्टी सूंघकर धरती की अच्छी या बुरी किस्म भी बता सकते हैं। पंडित जी हिसाब-किताब में बहुत पाक-साफ हैं।

पिछले साल जब उनका छोटा भाई बिस्तर पर मौत से जिंदगी की जंग लड़ रहा था तो वे अपना पोथी-पत्रा लेकर पुराना हिसाब देख रहे थे और भाई के इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले ही उसका खेत हड़प लिया।

वे ब्याज पर पैसे उधार देते हैं और बड़े सूदखोर हैं। उनके दिल में कोई रहम नहीं है। उन्हें इस बात का बड़ा गर्व है कि उनके ब्याज के चंगुल से आज तक कोई नहीं निकल पाया है।

मैं उनकी तुलना एक ऐसे शिकारी से करता हूं जिसकी नजर हर वक्त इन्सानी गोश्त पर रहती है। उनके एक हाथ में सूद का जाल और दूसरे में धर्म की छुरी है जिसे वे अपने मन मुताबिक तेज करते रहते हैं।

मेरे घर के नजदीक एक और इन्सान रहता है। कई साल पहले उसकी मां मर गई थी। तब पूरे धार्मिक कार्यक्रम पंडित जी ने ही करवाए थे। उस इन्सान ने मां के मृत्युभोज के लिए पंडित जी से रुपए उधार लिए।

तय दिन गांव के लोगों ने खूब पकवान उड़ाए। मुझे यह रस्म बिल्कुल पसंद नहीं आई और मैं आधी खाई हुई जलेबी पत्तल में छोड़कर आ गया। यह कहां तक जायज है कि जहां अभी आंखों से आंसू भी नहीं सूखे वहां बैठकर लोग दावत उड़ाएं। हे ईश्वर, क्या ये लोग तुम्हारे ही घर से आए हैं!

कई साल तक वह इन्सान पंडित प्रभुदयाल का कर्ज चुकाता रहा। उसने अपनी लड़की की पढ़ाई छुटा दी और उसके लिए लड़का ढूंढ़ने लगा, लेकिन बदकिस्मती से कोई भी लड़का सस्ता नहीं मिल रहा था।

उसने प्रभुदयाल से दहेज के लिए और कर्जा लिया। आखिर एक दिन उसे एक ठीक-ठाक लड़का मिल गया और उसने लड़की की शादी कर दी। उसका खेत अब प्रभुदयाल का हो चुका था क्योंकि वह बहुत ऊंची ब्याज दर का कर्ज नहीं चुका सका।

उस दिन मैं भी बहुत रोया और मैंने भी कसम खाई कि कभी ब्याज नहीं लूंगा, क्योंकि यह गरीब को और गरीब बनाता है। मैं कभी दहेज भी नहीं लूंगा, क्योंकि यह भी गरीब को और गरीब बनाता है। अगर मुमकिन हुआ तो मैं ऐसी शादी में भी नहीं जाऊंगा जहां दहेज लिया या दिया जाए। मैं कभी मृत्यु भोज में नहीं जाऊंगा, क्योंकि यह भी गरीब को और गरीब बनाता है।

एक सुबह पंडित जी के घर से बड़ी मधुर आवाज आ रही थी। मैंने ध्यान से सुना। वह एक भजन था - प्रभु मोरे अवगुन चित्त न धरो। मैं खुद को ऐसा मीठा भजन सुनने से रोक न सका और उनके घर चल दिया। घर पहुंचने पर मालूम हुआ कि वह भजन पंडित जी गा रहे थे। वे अभी-अभी एक विधवा के घर जा चुके हैं। आज उसकी जमीन हड़पने की तारीख है।

मैंने पास ही रखे पंडित जी के झोले से एक किताब निकाली और पढ़ने लगा। उसमें लिखा था - जिसने भी रुपए उधार दिए, वह पुण्य का भागी है क्योंकि उसने एक इन्सान को गुनाह करने से बचा लिया। जिसने भी उधार दिए धन से ब्याज कमाया, वह महापापी है, समझो उसने अपने भाई को कत्ल कर उसका गोश्त खा लिया।

चेतावनी- इस घटना के पात्रों का जिंदा या मुर्दा इन्सानों से कोर्इ संबंध नहीं है। अगर कोर्इ संबंध पाया गया तो वह खुद जिम्मेदार होगा।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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