क्या देखते हो लोगों, हर आंसू का हिसाब देना होगा


क्या इन्सान को अपने गुनाह का बदला मिलता है? इस सवाल के बारे में अक्सर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि दुनिया में तो बुराई का ही बोलबाला है। अच्छे लोगों की कोर्इ नहीं सुनता और दुष्टों को लाख बुराई के बावजूद हमेशा तरक्की मिल जाती है।

हम लोग ऐसा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू बहुत कम लोग ही देख, सुन और समझ पाते हैं। अच्छाई एक दिन फल जरूर देती है, भले ही थोड़ा वक्त लग जाए। इसी तरह बुराई भी अपना असर जरूर दिखाती है। बस थोड़ा वक्त लग जाता है।

यह वक्त इसलिए लगता है क्योंकि परमात्मा या अल्लाह उस व्यक्ति को सुधरने के लिए थोड़ा समय देता है, लेकिन यकीन कीजिए भलाई और बुराई एक दिन जरूर अपना फल देती हैं।

मैं मेरी जिंदगी की एेसी कुछ घटनाआें का भी आगे जिक्र करूंगा जब मुझसे गलती हुर्इ आैर उसका विचित्र तरीके से फल भी मुझे मिला आैर बहुत जल्द मिला।

तब मैंने एेसा महसूस किया कि भलार्इ करने के बाद आप चाहें तो उसे भूल जाएं क्योंकि उसका नेक बदला मिलेगा आैर उससे हमें कोर्इ नुकसान नहीं है लेकिन बुरार्इ करने के बाद मुझे यह नहीं भूलना चाहिए कि हर लम्हा उसका बदला मेरी आेर बढ़ता जा रहा है आैर वह लाखों लोगों में भी मुझे ढूंढ निकालेगा।

आज मैं पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) के एक साथी की जिंदगी से जुड़ी घटना यहां पेश कर रहा हूं। इसके बाद आपका इस बात पर पुख्ता भरोसा हो जाएगा कि बुराई अपना फल एक दिन जरूर देती है और हमें ऐसे कामों से बचना चाहिए।

यह तब की बात है जब मुहम्मद साहब (सल्ल.) के खिलाफ मक्का में उनके दुश्मन संगठित हो रहे थे। वे न केवल उनका बल्कि उनके साथियों का भी अपमान करने का कोर्इ मौका नहीं छाेड़ते थे। यहां तक कि भयंकर जुल्म भी करते थे।

ऐसे ही एक व्यक्ति थे हजरत खब्बाब। उन्हें इतने कष्ट दिए गए कि सुनकर दिल दहल जाता है। उस जमाने में कई देशों में गुलामी प्रथा का प्रचलन था। खब्बाब भी गुलाम बना दिए गए।

वे उम्मे-अंमार नाम की एक महिला के घर पर काम करते थे। उम्मे-अंमार को अपने धन का घमंड था और वह अपने नौकरों से बहुत बुरा बर्ताव करती थी।

एक दिन उम्मे-अंमार ने कोयले गर्म किए। जब वे सुलग कर एकदम लाल हो गए तो खब्बाब को हुक्म दिया कि वे जलते कोयलों पर लेट जाएं। वे लेट गए। वे तब तक लेटे रहे जब तक कि सभी कोयले ठंडे नहीं हो गए।

एक दिन तो उससे भी ज्यादा बुरा सलूक किया गया। उम्मे-अंमार ने कोयले गर्म किए और उसने लोहे की छड़ें मंगवाईं। छड़ें गर्म कीं और गर्म-गर्म ही खब्बाब के सिर पर लगा दीं।

उसने वे छड़ें तब तक लगाई रखीं जब तक कि वे ठंडी नहीं हो गईं। इतने भयंकर अत्याचार सहते हुए खब्बाब एक दिन मुहम्मद साहब (सल्ल.) से मिले। उनसे अपनी पीड़ा कही। उन्होंने उनके लिए दुआ की।

कुछ दिनों बाद ही बात है। एक दिन उम्मे-अंमार को सिर में दर्द महसूस हुआ। धन की उसके पास कमी नहीं थी, इसलिए वह कई बड़े और मशहूर हकीमों के पास गई, उनसे अपना हाल कहा, लेकिन उसकी बीमारी ठीक नहीं हुई।

फिर वह एक और हकीम के पास गई। उसने दवा दी और साथ ही बीमारी के इलाज के लिए एक उपाय भी बताया।

हकीम ने बताया, सिर की इस बीमारी के इलाज के लिए जरूरी है कि रोज कुछ छड़ें गर्म किया करें और उनसे अपने सिर को दागा करें। इस बीमारी के इलाज के लिए ऐसा करना ही होगा। वर्ना यह पूरे सिर में फैल जाएगी।

उम्मे-अंमार घर आ गईं और खब्बाब से बोलीं - छड़ें गर्म कीजिए। खब्बाब ने छड़ें गर्म कीं। शायद उन्हें आशंका रही होगी कि आज उन्हें फिर सताया जाएगा। छड़ें गर्म होने के बाद उम्मे-अंमार बोली - इन्हें मेरे सिर में दागिए।

खब्बाब हुक्म का पालन करने लगे आैर उम्मे-अंमार के सिर में गर्म छड़ें दागने लगे। यह वही उम्मे-अंमार थी जिसने जुल्म की सभी हदें पार कर दी थीं। आज ऊपरवाला उसे अपने गुनाहों की सजा दे रहा था।

इसलिए साथियों, यह वक्त आंखें खोलने का है। अपनी गठरी आैर भारी मत कीजिए क्योंकि इसका बोझ आपको ही उठाना है। चाहे आप किसी भी किताब को मानने वाले क्यों न हाें, उस हर एक आंसू का हिसाब देना होगा जो आपकी या मेरी वजह से किसी दुखी प्राणी की आंखों में आया था। चलता हूं, फिर मिलूंगा।

राम-राम, सलाम!

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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