तुम्हें कौनसी शक्ल दिखाऊं बापू, मेरे हाथ तो खून से रंगे हैं

बापू के नाम यह खत मैंने 2 अक्टूबर 2013 को लिखा था। इसकी ज्यादातर बातें आज भी सच लगती हैं। खासतौर से खून से हाथ रंगे होने की। उस वक्त हमने मुजफ्फर नगर के दंगों में अपने हाथ रंगे थे आैर इस साल दादरी इलाक़े के बिसाहड़ा गांव में, जहां भीड़ ने सिर्फ अफवाह सुनकर अखलाक अहमद को मार डाला। इस बार मैं बापू को जन्मदिन की बधार्इ नहीं दूंगा क्योंकि हमारे हाथ खून से रंगे हैं।

प्यारे बापू,

सादर प्रणाम!

यह पत्र मैं तुम्हें धरती के उस हिस्से से लिख रहा हूं जिसकी आजादी के लिए तुमने पूरी जिंदगी दे दी थी। मुझे दुख है कि हम तुम्हें गोली के अलावा कुछ नहीं दे सके।

आगे समाचार यह है कि तुम्हारी गैर-मौजूदगी का हमने पूरा-पूरा फायदा उठाना सीख लिया है। जिस भारत की कहानी तुम अपने लहू की स्याही से लिख रहे थे, उसे हमने महाभारत बना दिया है।

हमने ताजा-ताजा खून से हाथ रंगे हैं। हमें आज हर इन्सान में ‘चोर’ दिखाई देता है, लेकिन हम खुद को सुधारने की कोई जरूरत नहीं समझते।

हक मांगने के मामले में हम बहुत जागरूक हो गए है और फर्ज की बातें हमें बिल्कुल पसंद नहीं। जिस राजनीति को तुम सेवा का सबसे बड़ा जरिया मानते थे, आज वह कुछ लोगों के हाथों की बंधुआ मजदूर हो गई है।

अगर तुम स्वर्ग से देख सकते हो तो आज के हिंदुस्तान को जरूर देखना। मेरा दावा है, तुमने ऐसे हिंदुस्तान का कभी सपना नहीं देखा होगा। मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसे हालात में तुम्हारी रूह जन्नत में नहीं होगी।

मैं एक गांव का लड़का हूं। गांव तुम्हें बहुत पसंद हैं, इसलिए यह बात कह रहा हूं। जिंदगी में मैंने कई गलतियां की हैं। मुझे अफसोस है कि कोई भी गलती आखिरी नहीं होती। इन दिनों मैं कुछ खास वजहों से परेशान हूं। यदि तुम्हारे पास इसका कोई इलाज हो तो बताना।

- सुबह जब मैं इंटरनेट शुरू करता हूं तो वहां समाचार वेबसाइट पर महिलाओं की अश्लील तस्वीरें आती हैं। मेरे कुछ परिचित लोग मोबाइल पर ऐसी ही फिल्में देखते हैं और मुझे भी देखने की प्रेरणा देते हैं।

एक लड़का मुझसे कुछ दूरी पर बैठता है और पूरा दिन अपने कम्प्यूटर पर ऐसी ही फिल्में देखता रहता है। शाम को जब मैं घर जाता हूं तो बस में भी लोग अश्लील बातें करते हैं और रास्ते में लड़कियों पर अभद्र टिप्पणी करते हैं।

एक-दो बार मैंने विरोध किया तो लोग कहते हैं कि तुम इस ग्रह के प्राणी नहीं हो। अगर मर्द हो तो मर्दों वाली हरकतें अनिवार्य हैं। कई लोग मुझे कहते हैं कि तुम निरे उल्लू हो, जो अभी तक दारू नहीं पी।

इस दम घोंटू माहौल से मैं परेशान हो गया हूं। अब मुझे भी थोड़ा शक होने लगा है कि शायद मैं भटक कर किसी गलत जगह आ गया हूं। क्या मेरा नजरिया गलत है? तुम ही बताओ।

- मैंने घर और परिवार सहित कई लोगों को आंसू दिए हैं। ये आंसू खुशी के बिल्कुल नहीं थे। जिन लोगों ने कभी मेरी बहुत मदद की, बाद में हालात ऐसे बने कि मैं उनके लिए दुख की वजह बना।

मैंने कुछ लोगों का भरोसा तोड़ा है। इस बात के लिए मैं बेहद-बेहद शर्मिंदा हूं। जब मैं तीसरी कक्षा में था, तो परीक्षा के दिन अलमारी से तख्ती निकाल रहा था।

तब मेरा कद छोटा था, अलमारी बड़ी थी। मेरी दादी मां का चश्मा तख्ती पर रखा था। जल्दबाजी में चश्मा नीचे गिरकर फूट गया। मैंने तुरंत स्कूल की राह ली और किसी को कुछ नहीं बताया।

शाम को मामले की पूछ हुई तो मार के भय से मैं साफ मुकर गया। अगर मैं उस दिन सच बोलता तो मुझे मार पड़नी तय थी, ठीक उसी तरह जैसे कल का सूरज निकलना तय है।

तुम कहते हो सत्य में ताकत है, लेकिन मुझे सच बोलने से डर लगता है, क्योंकि आज सच बोलने वाला सिर्फ मार का हकदार बनता है। ऐसा क्यों है?

- कुछ साल पहले की बात है। मैं और मेरा एक दोस्त बरसात के पानी में पत्थर फेंक रहे थे। तभी अचानक कहीं से एक चिड़िया आई और मेरे पत्थर का शिकार बन गई। उसकी तुरंत मौत हो गई।

मुझे याद है उसके मुंह से लाल खून आ रहा था। उस दिन का मुझे बहुत दुख है। मैं उसे मारना नहीं चाहता था, बावजूद इसके यह सही है कि मैं उसका हत्यारा हूं।

उस दिन के बाद मैंने कभी पत्थर नहीं फेंका, लेकिन उस चिड़िया के मरने का दुख मुझे आज भी है। अनजाने में ही सही, मैंने अपराध तो किया है। उस अपराध से मैं कैसे मुक्ति पा सकता हूं?

- मेरे पास प्रश्नों का बहुत बड़ा पिटारा है, लेकिन मैं बहुत कम सवाल पूछूंगा। एक अच्छी खबर यह है कि मैंने स्कूली दिनों में मेरे गांव में एक लाइब्रेरी शुरू की और उसे कई सालों तक जारी रखा।

अब मैं इंटरनेट पर उसे चला रहा हूं। उसका नाम - गांव का गुरुकुल है। अब तक हजारों लोगों तक इसे पहुंचा भी चुका हूं। लोग इसे बहुत पसंद कर रहे हैं। फिर भी मुझे लगता है कि यह अपर्याप्त है।

तुम्हारे जमाने में अक्षर ज्ञान बड़ी जरूरत थी, मेरे जमाने में कम्प्यूटर ज्ञान बहुत बड़ी जरूरत है। गांव की गलियों से निकलकर जब मैं जयपुर आया तो मालूम हुआ कि मैं सच में गंवार हूं। मैंने कम्प्यूटर तक नहीं देखा था। यहां मेरी खूब हंसी हुई। उस वक्त मुझ पर जो बीती, वह मैं ही जानता हूं।

आज मैं कम्प्यूटर चलाना ठीकठाक सीख गया हूं। मेरी दिली इच्छा है कि भारत के गांवों के लिए एक स्कूल शुरू करूं जहां मोटी-मोटी किताबें आैर पीट-पीटकर पढ़ाने वाले मास्टर न हों।

मैंने जीवन में सिर्फ चार ही सपने पाले हैं और इसके अलावा मेरी कोई बड़ी इच्छा नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि राजीव, तुम बहुत गहरे अंधेरे में हो। तुम्हारे ये सपने कभी पूरे नहीं हो सकते।

- देश में बूंद-पानी ठीक बरसा है और इस साल अच्छी फसल की उम्मीद है। साथ ही इस साल न्यायपालिका भी खासी सक्रिय रही है और बड़े-बड़े लोग जेल गए।

न्याय चक्र बहुत दिनों बाद ही सही, चल पड़ा है। इसके अलावा और कोई अच्छा समाचार नहीं है। सर्दियां आने वाली हैं, ध्यान रखना।

गांव का वह बूढ़ा लोहार बहुत अच्छी सिगड़ी बनाता है। कहो तो एक सिगड़ी तुम्हारे लिए भेज दूं। मेरे सवालों के जवाब जल्दी भेजना, नहीं तो अगला पत्र बैरंग भेजूंगा। दुनिया आज तुम्हारी बातों को सच मानने लगी है। उम्मीद है कि एक दिन हम भी तुम्हारा कहना मानेंगे। उसी दिन के इंतजार में...

तुम्हारा एक बेटा
राजीव शर्मा
गांव का गुरुकुल

तारीख- 2 अक्टूबर 2013

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