पेरिस के लोगों, मुझे पूरी हमदर्दी है लेकिन मैं आपके समर्थन में अपनी Profile Pic का रंग नहीं बदलूंगा

पेरिस हो या पंजाब, हमने धमाकों में सिर्फ बेगुनाह लोगों को मरते देखा है। बारूद का सौदा करने वाले कभी इस बात की परवाह नहीं किया करते कि इसके धमाके किसे बख्शेंगे आैर किसकी जान लेंगे, क्योंकि मौत के सौदागरों की जान सदा सलामत रहती है।

दो दशक पहले जब आतंकवादी गिरोह कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से निकाल रहे थे तब हिंदुस्तान बुलंद आवाज में दुनिया को बता रहा था कि इसे आतंकवाद कहते हैं ... लेकिन यूएन आैर अमरीका कहते कि यह तो दो देशों का छोटा-मोटा आपसी मसला है। इसलिए भारत को ज्यादा शोर नहीं मचाना चाहिए।

हमने 26/11 की कर्इ बरसियां मना लीं आैर हर बार दुनिया को बताते रहे कि इसे आतंकवाद कहते हैं लेकिन मुंबर्इ के वे धमाके इसकी गलियों में ही गुम हो गए, वे कभी यूरोप आैर अमरीका के कानों तक नहीं पहुंचे।

आज जो ISIS पेरिस तक पहुंच गया है, वह अमरीका की उसी नसीहत का नतीजा है जिसमें भारत को हर बार शांति बनाए रखने का संदेश मिलता आैर अातंकवाद फैलाने वाले देशों को अमरीकी डाॅलर।

मैं भी मानता हूं कि पेरिस के धमाके मानवता के विरुद्घ अपराध हैं आैर इसमें मरने वाले लोग बेकसूर हैं। जिन्हाेंने भी इस घटना को अंजाम दिया है उनके खिलाफ सख्त कार्रवार्इ में देरी नहीं होनी चाहिए लेकिन मैं यह भी पूछना चाहता हूं कि अमरीकी आैर यूरोपियन मीडिया को सिर्फ गोरे लोगों का खून ही क्यों दिखता है?

आपके कैमरे उस वक्त धुंधले क्यों हो जाते हैं जब कश्मीर आतंकवाद से जल रहा था? आप उन लम्हों को क्यों भूल जाते हैं जब अमरीकी लड़ाकू विमान बगदाद के आसमान से मौत के शोले बरसा रहे थे? आप उस वक्त खामोश क्यों हो जाते हैं जब अमरीका के इस विजय अभियान में लाखों लोगों के खून से धरती लाल हो गर्इ?

हम तो 1947 से रोज पेरिस जैसे हालात का सामना कर रहे हैं। हमारी शेखावाटी की धरती से कर्इ बहादुर फाैजी कारगिल में शहीद हुए, मेरे गांव के कर्इ जांबाजों की उम्र कश्मीर में आतंकवादियों काे मुंहतोड़ जवाब देने में बीत गर्इ, मगर दुनिया को सिर्फ पेरिस आैर न्यूयाॅर्क ही दिखते हैं।

अगर वहां का मातम खत्म हो जाए तो कभी कश्मीरी पंडितों के हाल भी पूछिए, कभी उन लोगों के जख्म भी देखिए जो हर साल 26/11 पर हरे हो जाते हैं, कभी इराक के उन लोगों का गम भी जानिए जिनके सिर से अमरीकी फौजों ने मां-बाप का साया छीन लिया।

ISIS का खतरा पैदा होने के जिम्मेदार अमरीका आैर उसके युद्घप्रेमी पूर्व राष्ट्रपति श्री जाॅर्ज डब्ल्यू बुश हैं जिन्होंने इराक को तो खंडहर बना दिया आैर आतंक फैलाने वाले देशों को अरबों डाॅलर की मदद दी। अगर इराक पर हमला नहीं होता तो ISIS कभी पैदा नहीं होता। ताज्जुब है कि जो देश आतंकवाद की पाठशाला चलाते रहे उनके खिलाफ कार्रवार्इ करने की अमरीका ने कभी हिम्मत नहीं दिखार्इ।

पेरिस के लोगों, मुझे पूरी हमदर्दी है लेकिन मैं आपके समर्थन में अपनी Profile Pic का रंग तभी बदलूंगा जब दुनिया कश्मीर, मुंबर्इ आैर इराक के जख्म भी देखे।

जय हिंद!

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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