मंदिर का फूल और मस्जिद का पानी किसी में कभी फर्क नहीं करते



जैसा मैंने देखा, जैसा मैंने समझाः

किसी एक धर्म के प्रति कट्टरता, किसी एक देश या जाति के लोगों को ही सबसे अच्छा या सबसे बुरा समझना सबसे बड़ी मूर्खता है। जहां कहीं जो अच्छाई है, उसकी कद्र करनी चाहिए।

सूली पर चढ़े यीशु और पत्थरों की मार से घायल हुए मुहम्मद साहब (सल्ल.) के खून का रंग उस वक्त भी वैसा ही था, जैसा आज आपके खून का रंग है।

मंदिर का फूल और मस्जिद का पानी किसी में कभी फर्क नहीं करते। एक बिना मजहब पूछे खुशबू फैलाता है, दूसरा वुजू के साथ हर इन्सान और परिंदे की प्यास बुझाता है।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

(From My Old Diary-- January 2011)

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