रब सब सुन रहा था, अगर मैं कुछ और मांग लेता तो मिल जाता



कल शाम को घर जाते वक्त बस में बहुत भीड़ थी। मैं एक कोने में दुबका खड़ा था। साथ में किताबों का भारी थैला। इसलिए खड़े-खड़े पैरों में दर्द होने लगा।

मैंने मन में दुआ की ताकि यह दिक्कत दूर हो।

मैंने देखा, तुरंत मेरे लिए एक सीट खाली हो गई। मैं खुशी-खुशी उस पर बैठ गया।

तभी खयाल आया, इस वक्त रब ने मेरी दुआ कबूल कर ली। अगर मैं दुआ में सीट के बजाय कुछ और मांग लेता तो वह भी कबूल हो जाती।

- राजीव शर्मा, कोलसिया-

(मेरी डायरी से-25 दिसंबर 2011)

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