वे सीमा पर जागते हैं तभी हम घरों में सुकून से सोते हैं



अभी सर्दी की महज शुरुआत है और आज सुबह जब मैं ये अक्षर टाइप कर रहा हूं तो अंगुलियां कांप रही हैं।

ऐसे में हमारे बहादुर सैनिक सीमा पर मुस्तैदी से अपने फर्ज को अंजाम दे रहे हैं, बिना शिकवा-शिकायत किए।

वे सीमा पर जागते हैं तभी हम घरों में सुकून से सो पाते हैं। उनके कष्ट का तो अंदाजा लगाना भी बहुत मुश्किल है। जो लोग बात-बात पर हड़ताल के झंडे उठा लेते हैं वे इस तस्वीर को जरा गौर से देखें।

- राजीव शर्मा, कोलसिया -

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