नजर उठाकर देख ले हिंदुस्तान, तेरा कोई दोस्त नहीं है



पठानकोट की गलियों से आती गोलियों की आवाज अब खामोश हो चुकी है। यहां की हवा सन्नाटे से भरी है और अखबार हमारे खून से। एक अजीब किस्म की बेचैनी है, एक खास तरह की उदासी है। आखिर मेरा हिंदुस्तान इतना उदास क्यों है?

हर साल दहशत के दुकानदार हमारे देश में नफरत का सौदा करते हैं। बेकसूर और मासूम लोगों को मौत के घाट उतारते हैं। हम दुश्मन को सबक सिखाने के दावे करते हैं, सरकार हमसे वायदे करती है और धीरे-धीरे हम सब भूल जाते हैं, क्योंकि हमें ऐसे ही किसी एक और धमाके का इंतजार होता है। आखिर हम इतने लाचार क्यों हैं?

धमाके तो पेरिस में भी हुए थे जिसका हमने और पूरी दुनिया ने मातम मनाया था। लोगों ने फ्रांस के पक्ष में अपनी फेसबुक फोटो का रंग बदला, मगर पठानकोट पर हमले के बाद सिर्फ हमारे देश में ही इसे लेकर गुस्सा है। दूसरे देशों ने तो सिर्फ अपने बयान दिए और आधी से ज्यादा दुनिया तो भूल गई होगी कि भारत में कहीं कोई हमला भी हुआ था। शायद धमाकों में मौत होना हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। दुनिया कहां तक हमारी फिक्र करेगी, क्योंकि इस देश के लोगों को एक दूसरे की फिक्र नहीं है।

पठानकोट के दर्द को सिर्फ हिंदुस्तान ने महसूस किया। मुझे याद है वो वक्त जब अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था कि या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ हैं। पेरिस पर हमला हुआ तो दुनिया के कई ताकतवर देश एकजुट हो गए कि पानी हद से ज्यादा ऊपर आ गया और सब सीरिया पर बम बरसाने लगे।

लेकिन पठानकोट पर हमले के बाद दुनिया के इन पहरेदारों को गहरी नींद आ गई है। आज कोई नहीं कहता कि हम आतंक का सफाया करने में भारत का साथ देंगे। जिस अमरीका को दुनिया में शांति की बड़ी फिक्र है वह पाकिस्तान को अरबों डॉलर की मदद देता है। उसमें हिम्मत नहीं कि वह पाकिस्तान की सरकार को हुक्म दे कि पठानकोट के असली दरिंदे हमें सौंपो, हम उन्हें फांसी के फंदे पर टांगेंगे। क्यों?

क्योंकि इन हमलों में सिर्फ हिंदुस्तानी मरे हैं। शायद हिंदुस्तान के लहू का रंग कुछ और है, अमरीका के लहू का रंग कुछ और। विश्वमंच पर आतंक के खिलाफ जब हम सवाल उठाते हैं तो ये देश सिर्फ हां में हां मिलाते हैं। क्यों? क्योंकि वे जानते हैं कि हम हिंदुस्तानियों की आदत ऐसी है कि करोड़ों की तादाद में होने के बावजूद मुट्ठीभर लोग हममें फूट डाल सकते हैं। कोई क्यों आपका हमदर्द बनेगा?

अगर यही हमला रूस पर हुआ होता तो मि. पुतिन अब तक आतंकियों की चमड़ी उधेड़ देते। अगर हमले में ओबामा का डॉगी मारा जाता तो वे अपने जंगी जहाजों में बारूद भरकर फौरन रवाना कर देते कि जब प्रेसीडेंट का कुत्ता सुरक्षित नहीं है तो अमरीका के लोग कैसे सुरक्षित होंगे! इसलिए हमें अपनी फिक्र पहले है, दुनिया की बाद में।

मैं पूछता हूं कहां गए पेरिस का मातम मनाने वाले जिन्हें दुनिया की बड़ी फिक्र थी? यूरोप और अमरीका के लोग फेसबुक की तस्वीरों का रंग बदलना क्यों भूल गए? आखिर हम कब तक सिर्फ बातें बनाते रहेंगे?

अब मान भी लीजिए कि हम जंग में हैं और आज से नहीं बल्कि 1947 से। दुनिया में सबसे ज्यादा किसी ने आतंकवाद को बर्दाश्त किया है तो वह हमारा देश है। दुनिया को पेरिस के घाव दिखते हैं लेकिन हमारा पठानकोट उन्हें दिखाई क्यों नहीं देता? दुनिया में हमारा कोई साथी नहीं है। देख लो हिंदुस्तानियों, तुम्हारा कोई दोस्त नहीं है। क्यों? क्योंकि तुम खुद एक दूसरे के दुश्मन हो। दुनिया को तुम्हारी कोई परवाह नहीं है, तुम्हारी मौत का कोई गम नहीं है।

हम लोग आपस में इतने बंटे हुए हैं कि हमें दुश्मनों की जरूरत नहीं है। पं. नेहरू को गुजरे जमाना बीत गया लेकिन हम आज भी उन्हें कोसने में कमी नहीं छोड़ते। आज गद्दी पर मनमोहन सिंह नहीं हैं मगर कुछ लोग यही समझते हैं कि देश के असली गुनहगार सिर्फ मनमोहन सिंह हैं। जब आतंकवाद पर एकजुटता की बात होती है तो कुछ लोग कहते हैं कि वाजपेयी साहब बहुत नर्म मिजाज के आदमी हैं। उन्होंने भी तो विमान के बदले आतंकवादियों को छोड़ा था। आतंकवाद पर सख्त नीति हम चाहते ही नहीं।

हम भूतकाल में ही जीना चाहते हैं क्योंकि वर्तमान और भविष्य में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। भूतकाल को याद कर एक दूसरे से बदला लेना चाहते हैं, एक दूसरे को सबक सिखाना चाहते हैं। हमारा प्रधानमंत्री (किसी भी पार्टी से) जब कोई कदम उठाता है तो लोग उसका सिर्फ इसलिए विरोध करते हैं क्योंकि उन्हें तो विरोध करना ही है।

ऐसे हालात देखकर तो मैं कहूंगा कि हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री दुनिया में सबसे ज्यादा बेबस और मजबूर इन्सान है। उसकी तकलीफ कोई नहीं समझता। लोग भूल जाते हैं कि हम पर दुनिया का कितना कर्जा चढ़ा हुआ है! कैसी-कैसी बंदिशें हैं! भारत के प्रधानमंत्री को दुनिया से किन शर्तों के साथ समझौते करने होते हैं! उसका घर कमजोर है क्योंकि यहां भाईचारे की डोर कमजोर है। कोई भी हमें बांट सकता है। यह हमारा सदियों पुराना रोग है।

क्या सोचते हो कि दुनिया देखती नहीं है? सब देखती है लेकिन एक तमाशे के तौर पर। पिछला साल हमने फिजूल की बातों में गुजार दिया। दादरी, बीफ, मंदिर-मस्जिद के शोर में हम सुरक्षा को भूल गए। इसी का नतीजा है कि दुश्मन हमारे घर तक आ गया और दुनिया ने तमाशा देखा। बंद करो ये फिजूल की बातें और काम पर ध्यान दो। इस साल उन लोगों की आवाज बनना बंद करो जो मुल्क में फूट डालते हैं। देश की एकता बनाए रखो। अपनी सेना और सरकार का साथ दो।

देश में बरसात कम हुई है, फसलों में दम नहीं है, दुश्मन का हौसला बढ़ता जा रहा है। ऐसे में रब तुम पर रहम करे तो क्यों करे? तुम एक दूसरे पर कितना रहम करते हो? सियासत का कोई भी शातिर शिकारी किसी को ईमान के नाम पर भड़का सकता है तो किसी को संस्कृति के नाम पर। बदमाशों ने मुल्क में आग लगा रखी है। फिर हमें दुश्मन की जरूरत क्या है? एक दिन खुद ही लड़ते-लड़ते मर जाएंगे। ऐसे हालात में चाहे जितनी नमाजें पढ़ लो, चाहे जितने मंत्र जप लो, जब तक देश में भाईचारा नहीं होगा, न खुदा तुम्हारी मदद करेगा और न तुम्हारा भगवान।

जय हिंद।

- राजीव शर्मा -

Like My Facebook Page



Comments

  1. SAIL Vacancy 2019 For Steel Authority of India Ltd 428 OCT & Other Jobs. Apply Online For SAIL Vacancies before the last date.

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

मारवाड़ी में पढ़िए पैगम्बर मुहम्मद साहब की जीवनी

आखिरी हज में पैगम्बर मुहम्मद साहब (सल्ल.) ने पूरी दुनिया के नाम दिया था यह पैगाम

A-Part of Ganv Ka Gurukul